मंदिर में परिक्रमा का क्या है महत्व? जानिए किस देवी-देवता की कितनी प्रदक्षिणा मानी जाती है शुभ

धर्म-अध्यात्म

नई दिल्ली। हिंदू धार्मिक परंपराओं में पूजा-अर्चना के बाद देवी-देवताओं की परिक्रमा या प्रदक्षिणा करने की परंपरा रही है। धार्मिक मान्यताओं में प्रदक्षिणा को पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और मंदिरों में इसकी संख्या और विधि अलग हो सकती है।

🎯 क्या होती है प्रदक्षिणा?

देवता या किसी पवित्र स्थान के चारों ओर श्रद्धापूर्वक घूमने को परिक्रमा या प्रदक्षिणा कहा जाता है। पारंपरिक व्याख्या के अनुसार प्रदक्षिणा में देवता व्यक्ति के दाहिनी ओर रहते हैं और सामान्यतः परिक्रमा दक्षिणावर्त यानी घड़ी की दिशा में की जाती है।

धार्मिक परंपरा में केवल मंदिर या मूर्ति की ही नहीं, बल्कि नदियों, पर्वतों, पवित्र वृक्षों और तीर्थस्थलों की भी परिक्रमा का विधान मिलता है। गोवर्धन परिक्रमा, नर्मदा परिक्रमा, अयोध्या और काशी की परिक्रमा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

🎯 किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा?

धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग देवताओं के लिए अलग संख्या बताई गई है। एक प्रचलित परंपरा के अनुसार—

| देवी-देवता/पवित्र स्थान | प्रचलित परिक्रमा |

| ———————– | ———————————: |

| भगवान शिव | आधी परिक्रमा |

| माता दुर्गा | 1 परिक्रमा |

| भगवान गणेश | 3 परिक्रमा |

| हनुमान जी | 3 परिक्रमा |

| भगवान विष्णु | 4 परिक्रमा |

| सूर्यदेव | 7 परिक्रमा |

| पीपल वृक्ष | 108 परिक्रमा की परंपरा भी मिलती है |

इन संख्याओं को लेकर विभिन्न धार्मिक स्रोतों में अंतर भी मिलता है। उदाहरण के लिए कुछ परंपराओं में दुर्गा की 1, सूर्य की 7, गणेश की 3, विष्णु की 4 और शिव की आधी प्रदक्षिणा बताई गई है।

🎯 भगवान शिव की आधी परिक्रमा क्यों?

शिवलिंग की परिक्रमा के संबंध में आधी प्रदक्षिणा की परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसका संबंध शिवलिंग के जलाधारी/सोमसूत्र को पार न करने की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है। इसलिए सामान्य मंदिर-परिक्रमा की तरह शिवलिंग के चारों ओर पूरा चक्कर लगाने के बजाय निर्धारित स्थान तक जाकर वापस लौटने की परंपरा कई शिव मंदिरों में दिखाई देती है।

हालांकि मंदिर की वास्तु व्यवस्था और स्थानीय परंपरा के अनुसार व्यवहार अलग हो सकता है।

🎯 गणेश जी और हनुमान जी की तीन परिक्रमा

गणेश जी की तीन प्रदक्षिणा की परंपरा काफी प्रचलित है। इसी तरह हनुमान जी की भी तीन परिक्रमा करने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है।

🎯 भगवान विष्णु की चार परिक्रमा

भगवान विष्णु की पूजा में चार प्रदक्षिणा का विधान कई धार्मिक परंपराओं में मिलता है। इसके पीछे विष्णु के व्यापक और सर्वव्यापी स्वरूप से जुड़े धार्मिक प्रतीकात्मक अर्थ भी बताए जाते हैं।

🎯 सूर्यदेव की सात परिक्रमा

सूर्य उपासना में सात परिक्रमा की परंपरा भी मिलती है। धार्मिक मान्यताओं में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है और सात संख्या को सूर्य के रथ के सात घोड़ों सहित कई प्रतीकों से जोड़ा जाता है।

🎯 पीपल और बरगद की परिक्रमा

पवित्र वृक्षों में पीपल और बरगद की विशेष धार्मिक मान्यता है। पीपल की परिक्रमा के लिए अलग-अलग परंपराओं में अलग संख्या मिलती है। कुछ परंपराओं में 108 प्रदक्षिणा का विधान बताया जाता है, जबकि कई स्थानों पर कम संख्या में परिक्रमा करने की परंपरा है।

🎯 परिक्रमा हमेशा किस दिशा में करनी चाहिए?

परंपरागत रूप से प्रदक्षिणा दक्षिणावर्त की जाती है, यानी देवता व्यक्ति के दाहिनी ओर रहें। धार्मिक व्याख्या में इसी कारण इसे ‘प्रदक्षिणा’ कहा गया है।

लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर मंदिर में एक जैसी व्यवस्था नहीं होती। कुछ मंदिरों में गर्भगृह के आसपास मार्ग अलग होता है और कुछ स्थानों पर विशेष धार्मिक कारणों से परिक्रमा का मार्ग निर्धारित किया जाता है।

🎯 क्या हर देवता की यही संख्या निश्चित है?

नहीं। यह बात महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर परिक्रमा की अलग-अलग सूचियां मिलती हैं, लेकिन सभी सूचियां किसी एक सार्वभौमिक शास्त्रीय नियम का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। उपलब्ध धार्मिक सामग्री में भी अलग-अलग देवताओं और परंपराओं के लिए अलग संख्या मिलती है।

इसलिए किसी मंदिर में जाते समय **उस मंदिर की स्थापित परंपरा और पुजारी द्वारा बताए गए नियम** को प्राथमिकता देना बेहतर है।

🎯 धार्मिक मान्यता बनाम तथ्य

परिक्रमा से पुण्य, मनोकामना पूर्ति या विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलने जैसी बातें धार्मिक आस्था और मान्यताओं का हिस्सा हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

सार यह है कि परिक्रमा केवल चक्कर लगाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि हिंदू पूजा-पद्धति में श्रद्धा, समर्पण और देवता को केंद्र में रखने की प्रतीकात्मक परंपरा है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *