नई दिल्ली। दुनिया को करीब साढ़े चार सदियों से जिस विश्व मानचित्र के जरिए देखा और समझा जाता रहा है, उसमें बदलाव को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में बड़ा फैसला सामने आया है। 4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में नए कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन के प्रस्ताव पर मतदान हुआ, जिसे 193 सदस्य देशों में से 164 देशों का समर्थन मिला।
भारत ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। वहीं अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया। फ्रांस और ब्रिटेन समेत बड़ी संख्या में देशों ने नए मानचित्र के समर्थन में वोट दिया।
इस बदलाव के पीछे मुख्य तर्क यह है कि पारंपरिक मर्केटर प्रोजेक्शन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को समान अनुपात में प्रदर्शित नहीं करता। खास तौर पर अफ्रीका जैसे भूमध्य रेखा के आसपास स्थित महाद्वीप नक्शे पर वास्तविक आकार से काफी छोटे नजर आते हैं।
आखिर 457 साल बाद नक्शा बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले मर्केटर मानचित्र को वर्ष 1569 में यूरोपीय मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था।
इस प्रोजेक्शन का सबसे बड़ा फायदा समुद्री नेविगेशन था। समुद्री यात्राओं और दिशा निर्धारण के लिए यह बेहद उपयोगी साबित हुआ। इसी वजह से सदियों तक इसका इस्तेमाल जारी रहा।
लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा भी है। जैसे-जैसे कोई क्षेत्र भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ता है, नक्शे पर उसका आकार वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में बड़ा दिखाई देने लगता है।
यही वजह है कि उत्तरी गोलार्ध के कई देश और क्षेत्र नक्शे पर वास्तविक आकार से काफी बड़े नजर आते हैं।
ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण
मर्केटर प्रोजेक्शन की विकृति को समझने के लिए अक्सर ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण दिया जाता है।
ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल लगभग 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना है।
लेकिन पारंपरिक मर्केटर मानचित्र में दोनों का आकार काफी हद तक समान दिखाई देता है।
यही अंतर बताता है कि नक्शा भले ही समुद्री नेविगेशन के लिए उपयोगी रहा हो, लेकिन पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना करने के लिए यह सही तस्वीर नहीं देता।
क्या है नया Equal Earth Projection?
नए प्रस्ताव में Equal Earth Projection को अपनाने की बात कही गई है। यह प्रोजेक्शन पृथ्वी के विभिन्न भू-भागों के क्षेत्रफल को अधिक संतुलित तरीके से दिखाने के लिए बनाया गया है।
इसे वर्ष 2018 में कार्टोग्राफरों की एक टीम ने विकसित किया था।
इस प्रोजेक्शन में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों का आकार पारंपरिक मर्केटर नक्शे की तुलना में वास्तविक क्षेत्रफल के अधिक करीब दिखाई देता है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि पृथ्वी का वास्तविक आकार बदल गया है। बदलाव पृथ्वी को दिखाने के तरीके में है।
अफ्रीका में क्यों खुशी?
अफ्रीकी देशों और अफ्रीकी संघ के लिए यह मुद्दा केवल नक्शे की तकनीकी सटीकता तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि सदियों से इस्तेमाल होने वाले नक्शे ने दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के आकार को लेकर लोगों की धारणा को प्रभावित किया है।
इस प्रस्ताव को अफ्रीकी संघ के 54 सदस्य देशों का समर्थन मिला है।
प्रस्ताव पेश करने वाले टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने नक्शों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि मानचित्र शिक्षा और लोगों की दुनिया को देखने की सोच को प्रभावित करते हैं। उनके अनुसार, यदि नक्शा दुनिया की गलत तस्वीर प्रस्तुत करता है तो वही धारणा पीढ़ियों तक आगे बढ़ सकती है।
नए मानचित्र के समर्थकों का कहना है कि इससे अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित तरीके से होगा।
अमेरिका ने क्यों किया विरोध?
जहां बड़ी संख्या में देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, वहीं अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया।
अमेरिकी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि संगठन को मौजूदा वैश्विक समस्याओं पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। अमेरिकी पक्ष ने ऐसे प्रस्तावों को संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकताओं और उसकी विश्वसनीयता से जोड़कर सवाल उठाया।
अमेरिका की आपत्ति के कारणों में प्रस्ताव में पुराने मानचित्रों, उनके ऐतिहासिक प्रभाव और कथित असमान प्रतिनिधित्व से जुड़े विमर्श को भी शामिल किया गया।
फ्रांस ने भी किया समर्थन
फ्रांस ने नए मानचित्र का समर्थन किया है। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने भी मर्केटर प्रोजेक्शन की सीमाओं पर टिप्पणी की।
उनका कहना था कि इस पुराने प्रोजेक्शन में अमेरिका, रूस और चीन जैसे उत्तरी गोलार्ध के देशों का आकार अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया की तुलना में असामान्य रूप से बड़ा दिखाई देता है।
फ्रांस का तर्क है कि मानचित्र बदलने से दुनिया नहीं बदलती, लेकिन यदि किसी मानचित्र में वास्तविक आकार विकृत हो रहा है तो उसे अधिक सटीक तरीके से प्रस्तुत करना जरूरी है।
भारत ने किसका साथ दिया?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने नए Equal Earth आधारित मानचित्र के प्रस्ताव का समर्थन किया।
प्रस्ताव का उद्देश्य वैश्विक मानचित्रण में संतुलन लाना और दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों, विशेष रूप से अफ्रीका, के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सटीक तरीके से प्रदर्शित करना है।
प्रस्ताव में यह चिंता भी जताई गई कि मौजूदा सामान्य मानचित्र भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में स्थित भू-भागों के आकार को समान अनुपात में नहीं दिखाते। इसके कारण अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों का वास्तविक आकार कम दिखाई दे सकता है।
क्या अब हर जगह नया नक्शा इस्तेमाल होगा?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। मानचित्र के प्रोजेक्शन का बदलना पृथ्वी या देशों की सीमाओं के बदलने जैसा नहीं है।
अलग-अलग उद्देश्यों के लिए दुनिया में आज भी कई प्रकार के मानचित्र प्रोजेक्शन इस्तेमाल किए जाते हैं। मर्केटर प्रोजेक्शन समुद्री नेविगेशन जैसे विशिष्ट कार्यों में उपयोगी रहा है, जबकि Equal Earth जैसे प्रोजेक्शन का उद्देश्य क्षेत्रफल को अधिक संतुलित ढंग से प्रदर्शित करना है।
इसलिए यह बदलाव मुख्य रूप से इस बात से जुड़ा है कि दुनिया को नक्शे पर किस तरह प्रस्तुत किया जाए।
दुनिया नहीं बदली, उसे देखने का नजरिया बदल रहा है
457 साल पुराने मर्केटर प्रोजेक्शन की जगह अधिक क्षेत्रफल-सटीक प्रोजेक्शन को बढ़ावा देने की यह पहल सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व से जुड़ी बहस भी है।
एक तरफ अफ्रीकी देश इसे अपने महाद्वीप की वास्तविक भौगोलिक स्थिति को बेहतर तरीके से सामने लाने की दिशा में कदम मान रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका ने इसे संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकताओं से जोड़ते हुए इसका विरोध किया है।
भारत का नए प्रस्ताव के पक्ष में मतदान यह संकेत देता है कि नई दिल्ली ने अधिक क्षेत्रफल-सटीक वैश्विक मानचित्रण के विचार का समर्थन किया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सदियों से दुनिया को देखने का हमारा नजरिया भी नक्शे की तरह बदलने वाला है?
