चांद तक पहुंचा भारत, फिर भी हाथ से मैला ढोने की प्रथा खत्म नहीं हुई: बॉम्बे हाई कोर्ट

राष्ट्रीय

मुंबई। भारत अंतरिक्ष में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है, लेकिन देश में सदियों पुरानी एक अमानवीय सामाजिक प्रथा का पूरी तरह खत्म न होना चिंता का विषय बना हुआ है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने की प्रथा को लेकर राज्य और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है।

जस्टिस भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में भारत चांद तक पहुंचने की उपलब्धियां हासिल कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर समाज के कुछ लोगों को आज भी ऐसा काम करना पड़ रहा है जो उनकी मानवीय गरिमा के खिलाफ है।

अदालत ने यह टिप्पणी ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013’ को लागू करने में राज्य और स्थानीय अधिकारियों की कथित विफलता से जुड़ी याचिका पर की।

सदियों पुरानी सामाजिक बुराई पर कोर्ट की चिंता

हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को कानून के सामने समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसके बावजूद संविधान लागू होने के दशकों बाद भी देश ऐसी सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है।

अदालत के मुताबिक हाथ से मैला ढोना केवल रोजगार से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानव गरिमा और सामाजिक समानता से जुड़ा गंभीर सवाल है।

पीठ ने इस बात पर भी चिंता जताई कि एक विशेष सामाजिक वर्ग के लोग पीढ़ियों से इस अमानवीय काम में फंसते रहे हैं, जबकि इसे रोकने के लिए कानून और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले पहले से मौजूद हैं।

2013 के कानून के बावजूद क्यों जारी है प्रथा?

मैनुअल स्कैवेंजिंग को रोकने और इस काम से जुड़े लोगों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2013 में विशेष कानून बनाया था।

कानून का उद्देश्य हाथ से मैला उठाने की प्रथा पर रोक लगाना, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को रोकना तथा प्रभावित लोगों और उनके परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था करना है।

इसके बावजूद अदालत के सामने ऐसे मामले पहुंचे, जिनसे यह सवाल उठा कि कानून और सरकारी दावों के बावजूद जमीन पर स्थिति पूरी तरह क्यों नहीं बदली।

36 जिले ‘मुक्त’ घोषित करने के दावे पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि महाराष्ट्र के 36 जिलों को मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्त घोषित किया जा चुका है और अगस्त 2023 में जिलाधिकारियों की ओर से इसके प्रमाणपत्र भी जमा किए गए थे।

हालांकि बाद की सुनवाई में राज्य की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि यह स्थिति प्रमाणपत्र जारी किए जाने की तारीख के संदर्भ में थी।

याचिकाकर्ताओं ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए ऐसे मामलों का हवाला दिया जिनमें सफाई कर्मचारियों की मौतें सामने आई थीं।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार रिकॉर्ड में ऐसे 81 मामलों का उल्लेख है, जिनमें 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था। इन मामलों को अदालत के सामने यह दिखाने के लिए रखा गया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह खत्म होने का दावा जमीनी वास्तविकता से मेल नहीं खाता।

सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई थी मजदूर की मौत

याचिका से जुड़े मामले में मुंब्रा की एक हाउसिंग सोसाइटी में वर्ष 2022 में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान एक सफाई कर्मचारी की मौत का मामला भी सामने आया।

याचिका श्रमिक जनता संघ से जुड़े राजू माधवे और लेखक श्रेयस पांडे के साथ मिलकर दायर की गई थी। मृतक के परिवार को मुआवजा और जिम्मेदारी तय करने का मुद्दा भी इस मामले का हिस्सा रहा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह ने दलील दी कि सरकार की ओर से जारी आदेशों में मुआवजे की जिम्मेदारी राज्य या स्थानीय प्रशासन के बजाय निजी ठेकेदारों अथवा नियोक्ताओं पर डालने की कोशिश की गई थी।

मृत सफाई कर्मचारियों के परिवारों को 30 लाख रुपये

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुआवजे के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि निजी ठेकेदारों या निजी क्षेत्र के माध्यम से काम कर रहे जिन सफाई कर्मचारियों की ऐसी परिस्थितियों में मौत हुई है, उनके परिवार 30 लाख रुपये के मुआवजे के हकदार होंगे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि राज्य सरकार को देनी होगी और बाद में संबंधित नियोक्ता या ठेकेदार से रकम की वसूली की जा सकती है।

पीठ ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मामलों में पांच मृत सफाई कर्मचारियों के आश्रितों को भी 30-30 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सरकार के ‘आधे-अधूरे प्रयास’ पर नाराजगी

हाई कोर्ट ने राज्य की ओर से किए गए प्रयासों को पूरी तरह नकारा नहीं, लेकिन यह भी कहा कि अब तक की कार्रवाई से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस सामाजिक बुराई को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है।

अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि सरकारी एजेंसियों की कोशिशें अभी भी पर्याप्त और प्रभावी नजर नहीं आतीं।

कोर्ट का संदेश साफ था कि केवल कागजों पर किसी जिले को मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्त घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। जमीनी स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई व्यक्ति सीवर, सेप्टिक टैंक या मानव मल की सफाई जैसे खतरनाक और अमानवीय काम के लिए मजबूर न हो।

सिर्फ मुआवजा नहीं, व्यवस्था बदलने की जरूरत

अदालत के सामने आया मामला केवल मृत कर्मचारियों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी का भी है।

यदि किसी सफाई कर्मचारी की सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत होती है, तो सवाल उठता है कि—

  • उसे बिना पर्याप्त सुरक्षा के काम पर क्यों लगाया गया?
  • क्या संबंधित प्रशासन ने सुरक्षा नियमों की निगरानी की?
  • निजी ठेकेदार की जिम्मेदारी कैसे तय हुई?
  • मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक के बावजूद ऐसा काम क्यों कराया गया?
  • और सरकारी स्तर पर रोकथाम के दावे के बावजूद ऐसी घटनाएं क्यों सामने आ रही हैं?

इन सवालों का जवाब केवल मुआवजा देकर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करके और व्यवस्था में सुधार करके देना होगा।

चांद और तकनीक की उपलब्धियों के बीच सामाजिक असमानता का सवाल

बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति की तुलना समाज में मौजूद इस गंभीर समस्या से की है।

भारत चंद्रमा और अंतरिक्ष मिशनों में अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुका है। लेकिन यदि इसी देश में किसी नागरिक को जाति और सामाजिक परिस्थितियों के कारण मानव मल की सफाई जैसे काम में मजबूर होना पड़े, तो यह विकास और सामाजिक न्याय के बीच मौजूद अंतर को उजागर करता है।

कोर्ट की टिप्पणी ने फिर खड़ा किया बड़ा सवाल

मैनुअल स्कैवेंजिंग पर कानून लागू होने के वर्षों बाद भी ऐसी मौतों और मामलों का सामने आना सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर की ओर संकेत करता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश केवल पांच मृत कर्मचारियों के परिवारों को मुआवजा देने तक सीमित नहीं है। यह सरकार और स्थानीय प्रशासन के सामने एक व्यापक जिम्मेदारी भी रखता है—क्या भारत वास्तव में इस अमानवीय प्रथा को जड़ से खत्म करने में सफल हुआ है?

जब तक किसी भी सफाई कर्मचारी को असुरक्षित तरीके से सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरने की जरूरत पड़ती रहेगी, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि तकनीकी और आर्थिक विकास के बावजूद मानवीय गरिमा की रक्षा में हम कितनी दूर पहुंचे हैं।

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