पटना (Action Bharat) | बिहार की राजनीति में इन दिनों चुनावी मुद्दों के साथ-साथ राजनीतिक विरासत और दिवंगत नेताओं की पहचान को लेकर भी सियासी हलचल तेज हो गई है। शहरों, सड़कों और प्रमुख स्थानों के नामकरण से शुरू हुई यह बहस अब दिवंगत नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं लगाने और उनके नाम को सार्वजनिक स्थलों से जोड़ने की मांग तक पहुंच गई है।
इस राजनीतिक कवायद में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने तरीके से अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों को साधने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। पहले बख्तियारपुर का नाम बदलकर ‘नीतीशपुर’ करने की मांग सामने आई, फिर जनता दल यूनाइटेड के नाम में नीतीश कुमार का नाम जोड़ने का सुझाव आया। इसके बाद केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने अपने पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की विरासत को सामने रखा। अब राजद नेता तेजस्वी यादव ने शरद यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह और रामविलास पासवान जैसे तीन बड़े नेताओं की प्रतिमाएं लगाने की मांग कर इस बहस को और व्यापक कर दिया है।
• चिराग पासवान ने रखी थी रामविलास पासवान के नाम की मांग
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने इससे पहले मरीन ड्राइव गोलंबर का नाम अपने पिता रामविलास पासवान के नाम पर करने की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान की आदमकद प्रतिमाएं लगाने का सुझाव भी दिया था।
चिराग की इस मांग को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि उन्होंने बिहार की राजनीति की तीन अलग-अलग धाराओं से जुड़े प्रमुख नेताओं—नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान—को एक साथ सम्मान देने की बात कही थी।
• अब तेजस्वी यादव ने भी रामविलास पासवान को किया शामिल
चिराग पासवान की पहल के बाद अब तेजस्वी यादव ने भी रामविलास पासवान का नाम अपनी मांग में शामिल किया है। हालांकि, तेजस्वी की मांग केवल रामविलास पासवान तक सीमित नहीं रही। उन्होंने समाजवादी नेता शरद यादव और राजद के वरिष्ठ नेता रहे रघुवंश प्रसाद सिंह की प्रतिमाएं लगाने की मांग भी रखी है।
इससे बिहार की राजनीति में दिवंगत नेताओं की विरासत को लेकर चल रही बहस और महत्वपूर्ण हो गई है। इसे केवल प्रतिमा लगाने की मांग के रूप में नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
• शरद यादव, रघुवंश और रामविलास—तीनों के अलग राजनीतिक आधार
तेजस्वी यादव की मांग में शामिल तीनों नेताओं की बिहार की राजनीति में अलग-अलग पहचान रही है।
शरद यादव लंबे समय तक समाजवादी राजनीति और सामाजिक न्याय के प्रमुख चेहरों में रहे। वहीं रघुवंश प्रसाद सिंह राजद के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे और ग्रामीण तथा गरीब तबके से जुड़े मुद्दों पर उनकी अलग पहचान रही।
रामविलास पासवान ने बिहार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में दलित राजनीति के प्रमुख नेताओं में अपनी जगह बनाई। ऐसे में इन तीनों नेताओं को एक साथ सम्मान देने की मांग के जरिए तेजस्वी यादव ने समाजवादी राजनीति, सामाजिक न्याय और दलित राजनीति की अलग-अलग धाराओं को जोड़ने का राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
• क्या यह विरासत की सियासत में नई प्रतिस्पर्धा है?
बिहार की राजनीति में चिराग पासवान और तेजस्वी यादव दोनों अपेक्षाकृत युवा राजनीतिक चेहरों के तौर पर अपने-अपने राजनीतिक आधार को आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों की राजनीति का आधार और गठबंधन अलग हैं, लेकिन दिवंगत नेताओं की विरासत को लेकर सामने आई हालिया मांगों ने एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया है।
चिराग ने अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को प्रमुखता देने के साथ लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का नाम भी सम्मान के साथ लिया। इसके बाद तेजस्वी ने भी रामविलास पासवान को अपनी मांग में शामिल करते हुए शरद यादव और रघुवंश प्रसाद सिंह के नाम आगे किए। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिहार की राजनीति में अब युवा नेताओं के बीच दिवंगत दिग्गजों की विरासत और उनके सामाजिक प्रभाव को लेकर नई प्रतिस्पर्धा आकार ले रही है।
• NDA में नीतीश कुमार की विरासत का मुद्दा भी गरम
दूसरी ओर सत्ता पक्ष के भीतर भी नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को लेकर चर्चा जारी है। मंत्री संतोष कुमार सुमन की ओर से बख्तियारपुर का नाम बदलकर ‘नीतीशपुर’ करने की मांग और संजय झा की ओर से जदयू के नाम में नीतीश कुमार का नाम जोड़ने का सुझाव इसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बताया जा रहा है।
इस तरह एक तरफ एनडीए खेमे में नीतीश कुमार की राजनीतिक पहचान और विरासत को सार्वजनिक रूप से मजबूत करने की मांग सामने आ रही है, वहीं विपक्ष की ओर से समाजवादी, सामाजिक न्याय और दलित राजनीति से जुड़े पुराने चेहरों को आगे किया जा रहा है।
• तेजस्वी की मांग से बढ़ी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की चुनौती
इन अलग-अलग मांगों के बीच अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने फैसला लेने की चुनौती भी बढ़ गई है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता अपने पसंदीदा नेताओं को सार्वजनिक सम्मान देने और उनके नाम पर स्थानों या प्रतिमाओं की मांग कर रहे हैं।
सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि वह इन मांगों पर किस तरह निर्णय लेती है। यदि किसी एक नेता के नामकरण या प्रतिमा लगाने की मांग को मंजूरी मिलती है तो उसके राजनीतिक और सामाजिक संदेश पर भी चर्चा होना तय है।
• बिहार की राजनीति में प्रतीकों की लड़ाई हुई तेज
पूरे घटनाक्रम से साफ है कि बिहार की राजनीति में अब केवल नीतियों और चुनावी वादों के साथ-साथ राजनीतिक प्रतीकों और विरासत का महत्व भी बढ़ रहा है। दिवंगत नेताओं के नाम और उनकी प्रतिमाओं को सार्वजनिक स्थानों से जोड़ने की मांगें अलग-अलग सामाजिक समूहों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने का माध्यम बन रही हैं।
अब निगाहें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सरकार के फैसले पर रहेंगी कि रामविलास पासवान, शरद यादव और रघुवंश प्रसाद सिंह से जुड़ी मांगों पर सरकार क्या रुख अपनाती है और राजनीतिक विरासत को लेकर बिहार में चल रही इस नई बहस को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाता है।
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