नई दिल्ली | विश्वकर्मा पूजा 2026: हिंदू धार्मिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा को दिव्य वास्तुकार, शिल्पकार और निर्माण-कला से जुड़े देवता के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने देवताओं के लिए महलों, नगरों, वाहनों और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कारखानों, दुकानों और कार्यस्थलों में मशीनों तथा औजारों की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है।
पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा से जुड़े कई भव्य निर्माणों का उल्लेख मिलता है। इनमें सोने की लंका, इंद्रलोक/अमरावती, द्वारका और इंद्रप्रस्थ प्रमुख हैं। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के निर्माण से जुड़ी कथा भी विश्वकर्मा से जोड़ी जाती है। ये विवरण धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
1. सोने की लंका
- पौराणिक कथाओं में सोने की लंका को भगवान विश्वकर्मा की भव्य रचनाओं में प्रमुख स्थान दिया जाता है।
- स्रोत के अनुसार, शिव पुराण से जुड़ी कथा में भगवान शिव और माता पार्वती के लिए एक भव्य महल की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है।
- कथा के अनुसार रावण के आग्रह पर भगवान विश्वकर्मा ने समुद्र के बीच सोने की नगरी का निर्माण किया।
- बाद में यही लंका रावण की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध हुई।
- इसकी भव्यता और वास्तुशिल्प का वर्णन रामायण सहित विभिन्न धार्मिक परंपराओं में मिलता है।
2. इंद्रलोक और अमरावती
- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवताओं के राजा इंद्र की राजधानी अमरावती और इंद्रपुरी का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने किया था।
- कथाओं में इसे देवताओं की भव्य राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है।
- स्रोत में दिव्य रथों, विशाल महलों और विशेष तकनीक से निर्मित संरचनाओं का उल्लेख मिलता है।
- धार्मिक कथाओं में इंद्रलोक को देवताओं के सुरक्षित और वैभवशाली स्थान के रूप में बताया गया है।
3. भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी
- भगवान कृष्ण से जुड़ी पौराणिक कथाओं में द्वारका नगरी का विशेष महत्व है।
- कथा के अनुसार जब जरासंध ने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किया, तब कृष्ण ने अपने वंश और लोगों की सुरक्षा के लिए नई नगरी बसाने का निर्णय लिया।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने समुद्र के बीच द्वारका नगरी का निर्माण किया।
- स्रोत में इसे सोने और हीरों से सजी अत्यंत भव्य नगरी के रूप में वर्णित किया गया है।
4. महाभारत काल की इंद्रप्रस्थ नगरी
- महाभारत की पौराणिक कथा में पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ का विशेष उल्लेख मिलता है।
- स्रोत के अनुसार युधिष्ठिर के लिए नई नगरी के निर्माण से भगवान विश्वकर्मा को जोड़ा जाता है।
- इंद्रप्रस्थ का राजसभा भवन इसकी सबसे चर्चित विशेषताओं में बताया गया है।
- पौराणिक वर्णन में इस भवन में ऐसी अद्भुत भ्रम-रचना का उल्लेख है, जिसमें सूखी जमीन पर पानी दिखाई देता था और पानी के स्थान पर जमीन जैसी अनुभूति होती थी।
- इसी प्रसंग से जुड़ी कथा में दुर्योधन के पानी में गिरने और उसके बाद हुए उपहास का उल्लेख मिलता है।
5. भगवान जगन्नाथ की मूर्ति
- भगवान विश्वकर्मा को केवल नगरों और महलों के निर्माण से ही नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के निर्माण से जुड़ी पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है।
- स्रोत में स्कंद पुराण और नारद पुराण से संबंधित परंपरा का उल्लेख है।
- कथा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने एक वृद्ध बढ़ई का रूप धारण किया था।
- उन्होंने मूर्ति निर्माण के दौरान एक शर्त रखी थी कि निर्माण पूरा होने तक कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
- जब लंबे समय तक अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो रानी के कहने पर राजा ने दरवाजा खोल दिया। कथा के अनुसार इसके बाद विश्वकर्मा वहां से चले गए और मूर्ति का निर्माण उसी अवस्था में रह गया।
विश्वकर्मा पूजा पर क्यों होती है औजारों और मशीनों की पूजा?
भगवान विश्वकर्मा को शिल्प, निर्माण और तकनीकी कार्यों से जोड़कर देखा जाता है। इसी धार्मिक परंपरा के कारण विश्वकर्मा जयंती पर कारखानों, दुकानों और कार्यस्थलों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों, औजारों तथा उपकरणों की पूजा की जाती है।
कई जगहों पर लोग अपने वाहन, मशीनरी और काम से जुड़े उपकरणों की सफाई कर उन्हें पूजा में शामिल करते हैं। इसके पीछे काम के साधनों के प्रति सम्मान और उनके सुरक्षित एवं व्यवस्थित उपयोग की धार्मिक भावना जुड़ी हुई है।
धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथाओं का संदर्भ
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी लंका, अमरावती, द्वारका और इंद्रप्रस्थ जैसी रचनाओं की कथाएं धार्मिक और पौराणिक परंपराओं का हिस्सा हैं। इन कथाओं को आधुनिक ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इनके विवरण में अंतर भी मिल सकता है।
विश्वकर्मा जयंती इसी धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और निर्माण, शिल्प, तकनीक तथा श्रम से जुड़े साधनों का सम्मान करने का अवसर मानी जाती है।
