नई दिल्ली (Action Bharat) | दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में जमानत अर्जी पर सुनवाई से पहले पीड़िता को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िता को आपराधिक कार्यवाही के विभिन्न चरणों में शामिल होने का अधिकार है। इसमें आरोपित की नियमित जमानत अर्जी पर सुनवाई भी शामिल है।
ट्रायल कोर्ट ने नहीं भेजा था नोटिस
हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपित को जमानत देने से पहले पीड़ित महिला को नोटिस नहीं भेजा था। इसके बाद हाई कोर्ट ने जमानत आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि पीड़िता का पक्ष सुनकर जमानत अर्जी पर नए सिरे से फैसला किया जाए।
महिला ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धारा के तहत दर्ज FIR में आरोपित को नियमित जमानत दी गई थी।
BNSS की धारा 483(2) का हवाला
हाई कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता या उसके अधिकृत प्रतिनिधि की मौजूदगी का प्रावधान है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा मामले के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें आपराधिक कार्यवाही में पीड़ित के भाग लेने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
दो सप्ताह में नए सिरे से फैसला
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि पीड़िता को सुनवाई का अवसर देने के बाद अधिकतम दो सप्ताह के भीतर जमानत अर्जी पर नया फैसला लिया जाए।
हालांकि, तब तक आरोपित को दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, जब तक ट्रायल कोर्ट इस मामले में नए सिरे से निर्णय नहीं ले लेता।
Action Bharat | दिल्ली हाई कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले पर विशेष रिपोर्ट
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