26 साल तक बदली पहचान, फिर फिंगरप्रिंट ने खोला राज; 1995 के AIIMS अपहरण केस का दोषी देहरादून से गिरफ्तार

क्राइम

नई दिल्ली: 1995 के चर्चित ऋषि सेठी अपहरण मामले में उम्रकैद की सजा पाने के बाद करीब 26 साल से फरार चल रहे अमित यादव को दिल्ली क्राइम ब्रांच ने देहरादून से गिरफ्तार कर लिया है।

अमित यादव ने कथित तौर पर अपनी पहचान बदलकर देहरादून में बिल्डर के रूप में नया जीवन शुरू कर लिया था। लेकिन करीब 31 साल पुराने फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड ने उसकी पहचान फिर से उजागर कर दी।

🔴 1995 में हुआ था कारोबारी का अपहरण

12 सितंबर 1995 को एम्स के डायरेक्टर के आवास के पास कार में बैठे कारोबारी ऋषि सेठी का चार बदमाशों ने कथित तौर पर बंदूक की नोक पर अपहरण कर लिया था।

बदमाशों ने परिवार से एक करोड़ रुपये की फिरौती मांगी। बाद में 10 लाख रुपये की रकम मेरठ के एक होटल में पहुंचाने की योजना बनी।

16 सितंबर को अमित यादव फिरौती की रकम लेने पहुंचा, जहां पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के राज नगर स्थित एक मकान से ऋषि सेठी को बरामद किया गया। पुलिस के मुताबिक उन्हें स्टोर रूम में जंजीरों से बांधकर रखा गया था।

⚖️ मिली थी उम्रकैद की सजा

पटियाला हाउस कोर्ट ने 25 अगस्त 1999 को अमित यादव को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और ₹2.50 लाख जुर्माने की सजा सुनाई थी। दिसंबर 2000 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उसकी अपील खारिज करते हुए सजा बरकरार रखी।

इसके बाद उसे एक महीने की अंतरिम जमानत मिली, लेकिन वह वापस नहीं लौटा और करीब 26 साल तक कानून की पकड़ से बाहर रहा।

🕵️ फिंगरप्रिंट ने बदल दी पूरी जांच

क्राइम ब्रांच के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इतने लंबे समय बाद आरोपी की पहचान कैसे की जाए। जांच के दौरान टीम ने 1999 में सजा के समय रिकॉर्ड किए गए फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक डेटा को तलाशा।

इसी पुराने रिकॉर्ड की मदद से देहरादून में रह रहे व्यक्ति की पहचान अमित यादव के रूप में पुख्ता की गई।

🏗️ देहरादून में बन गया था बिल्डर

पूछताछ में सामने आया कि फरार होने के बाद अमित यादव ने गाजियाबाद का ठिकाना छोड़ा और अपने पुराने संपर्क खत्म कर दिए। उसने बागपत के पैतृक गांव की संपत्ति भी बेच दी।

इसके बाद वह ऋषिकेश और फिर 2001 में देहरादून चला गया। पुलिस के अनुसार उसने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए पहचान बदली और कंस्ट्रक्शन कारोबार में उतर गया।

करीब ढाई दशक तक वह देहरादून में बिल्डर के तौर पर सामान्य जिंदगी जीता रहा—लेकिन पुराना फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड आखिरकार उसकी नई पहचान पर भारी पड़ गया।

Action Bharat News | Crime Desk

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