पटना। पटना हाई कोर्ट ने एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को तीसरे वित्तीय उन्नयन यानी तीसरे MACP का लाभ देने से इनकार करने वाले बिहार सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय लेखा परीक्षा पास करना MACP के वित्तीय लाभ के लिए अनिवार्य पूर्व शर्त नहीं है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कर्मचारी को सभी परिणामी मौद्रिक लाभ देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति कुमार मनीष की एकलपीठ ने रथिंद्र कुमार बोस बनाम बिहार सरकार एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि MACP का उद्देश्य लंबे समय तक पदोन्नति का अवसर नहीं मिलने की स्थिति में कर्मचारियों को वित्तीय उन्नयन प्रदान करना है। यह नियमित या कार्यात्मक पदोन्नति से अलग व्यवस्था है।
1972 में हुई थी सरकारी नौकरी
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता रथिंद्र कुमार बोस की नियुक्ति 12 फरवरी 1972 को बिहार सरकार के लोक निर्माण विभाग (PWD) में जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर हुई थी। बाद में उनकी सेवा एनएच विंग में चली गई।
उन्हें दूसरा ACP/MACP 26 नवंबर 2009 से प्रदान किया गया था। इसके बाद 31 जनवरी 2012 को वह सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो गए।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने तीसरे MACP का लाभ दिए जाने की मांग की। उनका कहना था कि उन्हें नियमानुसार तीसरे वित्तीय उन्नयन का लाभ मिलना चाहिए, लेकिन उनके अभ्यावेदन पर विभाग की ओर से उचित कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।
सरकार ने तीसरा MACP देने से क्यों किया था इनकार?
बिहार सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि तीसरा MACP दूसरे MACP के 10 वर्ष पूरे होने के बाद ही देय होता है। चूंकि याचिकाकर्ता को दूसरा MACP 26 नवंबर 2009 से प्रभावी किया गया था, इसलिए सरकार के अनुसार तीसरा MACP 26 नवंबर 2019 से ही मिल सकता था।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता 2012 में ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। ऐसे में 2019 में देय होने वाला तीसरा MACP उन्हें नहीं दिया जा सकता था।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि दूसरे MACP के लाभ में देरी विभागीय परीक्षा पास नहीं करने के कारण हुई थी।
हाई कोर्ट ने सरकार की दलील नहीं मानी
पटना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय लेखा परीक्षा पास करना MACP के वित्तीय लाभ की अनिवार्य शर्त नहीं है।
अदालत ने अपने फैसले में पूर्व के न्यायिक निर्णयों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि ACP/MACP योजना का उद्देश्य उन कर्मचारियों को वित्तीय लाभ देना है, जिन्हें लंबे समय तक सेवा में रहने के बावजूद पदोन्नति के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि MACP एक वित्तीय उन्नयन है, न कि कार्यात्मक या नियमित पदोन्नति। इसलिए इसके लाभ को केवल विभागीय परीक्षा की शर्त से जोड़कर कर्मचारी को वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
2018 का स्क्रीनिंग कमेटी आदेश भी रद्द
हाई कोर्ट ने माना कि दूसरे MACP के संबंध में विभागीय परीक्षा से छूट मिलने की तारीख से लाभ प्रभावी मानना कानूनन उचित नहीं था।
इसी आधार पर अदालत ने 23 फरवरी 2018 को स्क्रीनिंग कमेटी की ओर से पारित आदेश को भी निरस्त कर दिया।
अदालत के इस फैसले से सेवानिवृत्त कर्मचारी को तीसरे MACP से जुड़े वित्तीय लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
तीन महीने में देने होंगे सभी मौद्रिक लाभ
पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को नियमानुसार सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं। इसमें वास्तविक मौद्रिक लाभ भी शामिल हैं।
अदालत ने सरकार को यह पूरी प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है।
इस फैसले के बाद लंबे समय तक सेवा के बावजूद पदोन्नति से वंचित रहे कर्मचारियों के लिए MACP से जुड़े मामलों में यह आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ किया है कि वित्तीय उन्नयन योजना का उद्देश्य सेवा में ठहराव की स्थिति को दूर करना है और केवल विभागीय परीक्षा के आधार पर पात्र कर्मचारी को इस लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
