टोल प्लाजा पर बड़ा फर्जीवाड़ा! बिना FASTag वाहनों से अवैध ऐप के जरिए वसूली का आरोप, ED की 14 ठिकानों पर छापेमारी

क्राइम

नई दिल्ली | देशभर के नेशनल हाईवे पर टोल वसूली व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा कथित फर्जीवाड़ा सामने आया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दावा किया है कि करीब 100 टोल प्लाजा पर बिना FASTag वाले वाहनों से टोल वसूलने के लिए कथित तौर पर दो अवैध ऐप का इस्तेमाल किया गया।

जांच एजेंसी के अनुसार ‘Mabdata’ और ‘Any’ नाम के ऐप के जरिए टोल संग्रह से संबंधित अनधिकृत लेनदेन किए गए और कथित तौर पर ऐसी रसीदें तैयार की गईं, जिनका आधिकारिक टोल संग्रह प्रणाली में सही तरीके से रिकॉर्ड नहीं किया गया।

इस मामले में ED ने 2 सितंबर को कई राज्यों में तलाशी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और NCR में कुल 14 ठिकानों पर कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है।

100 टोल प्लाजा तक फैले नेटवर्क की जांच

ED के अनुसार यह कथित तरीका केवल किसी एक टोल प्लाजा तक सीमित नहीं था। जांच में लगभग 100 टोल प्लाजा पर इस तरह की गतिविधियों के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं।

जांच एजेंसी का दावा है कि बिना FASTag वाले वाहनों से टोल वसूलने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कथित तौर पर ऐसे ऐप तैयार किए गए थे, जिनके माध्यम से टोल संग्रह से संबंधित जानकारी दर्ज की जाती थी।

जांच के दौरान इस नेटवर्क से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है।

छापेमारी में क्या-क्या मिला?

ED की तलाशी कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर करीब 1.03 करोड़ रुपये नकद बरामद किए गए।

इसके अलावा जांच एजेंसी ने:

  • खाता-बही और वित्तीय रिकॉर्ड
  • बैंक से संबंधित दस्तावेज
  • डिजिटल उपकरण
  • अन्य आपत्तिजनक दस्तावेज

जब्त किए हैं।

जांच एजेंसी के मुताबिक कार्रवाई के दौरान आठ बैंक खातों को फ्रीज किया गया है।

हालांकि, जब्त की गई रकम और दस्तावेजों का अंतिम कानूनी महत्व जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

बिना FASTag वाली गाड़ियों को बनाया गया निशाना?

मामले की जांच का एक प्रमुख पहलू बिना FASTag वाले वाहनों से टोल वसूली है।

FASTag व्यवस्था के तहत टोल शुल्क इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संबंधित वाहन के FASTag खाते से काटा जाता है। लेकिन जिन वाहनों पर FASTag नहीं होता, उनके लिए अलग प्रक्रिया के तहत टोल वसूली की जाती है।

ED का आरोप है कि इसी प्रक्रिया का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया गया और बिना FASTag वाले वाहनों से प्राप्त टोल राशि को अवैध ऐप के माध्यम से रिकॉर्ड करने की व्यवस्था बनाई गई।

कथित तौर पर नकली रसीदें बनाने का आरोप

जांच में सामने आए एक महत्वपूर्ण आरोप के मुताबिक इन ऐप के जरिए अनधिकृत या कथित नकली टोल रसीदें तैयार की जाती थीं।

पुलिस की शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इस तरह की रसीदों के इस्तेमाल से भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के आधिकारिक सिस्टम में टोल संग्रह की वास्तविक जानकारी छिपाई जाती थी।

यदि जांच में यह आरोप साबित होता है तो इससे सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचने और टोल संग्रह व्यवस्था में गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला बन सकता है।

NHAI के आधिकारिक रिकॉर्ड से जानकारी छिपाने का आरोप

मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कथित अवैध वसूली का पैसा और उसका रिकॉर्ड आधिकारिक टोल सिस्टम से कैसे अलग रखा गया।

पुलिस की शिकायत के अनुसार कथित अवैध ऐप के माध्यम से तैयार की गई रसीदों के कारण NHAI के आधिकारिक सिस्टम में वसूली की वास्तविक जानकारी दर्ज नहीं होती थी।

इससे कथित तौर पर टोल संग्रह और वास्तविक वसूली के आंकड़ों के बीच अंतर पैदा होता था।

अब ED इस बात की जांच कर रही है कि ऐसा नेटवर्क कितने समय से चल रहा था, इसमें कितनी रकम शामिल थी और इससे किन लोगों या संस्थाओं को आर्थिक लाभ हुआ।

जनवरी 2025 की FIR से शुरू हुई जांच

ED ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत जांच शुरू की है।

जांच एजेंसी ने उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर पुलिस द्वारा जनवरी 2025 में दर्ज FIR को आधार बनाकर कार्रवाई आगे बढ़ाई।

यह FIR अतरैला शिव गुलाम टोल प्लाजा और देश के कुछ अन्य टोल प्लाजा से जुड़े कथित धोखाधड़ी के मामले में दर्ज की गई थी।

इसके बाद मामले में वित्तीय लेनदेन और कथित अवैध वसूली से जुड़े पहलुओं की जांच ED के दायरे में आई।

बिचौलियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

ED की जांच में कथित तौर पर यह पहलू भी सामने आया है कि टोल वसूली की इस व्यवस्था में बिचौलियों की भूमिका हो सकती है।

इसके अलावा उन कंपनियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है जिन्हें NHAI की ओर से टोल संग्रह का काम सौंपा गया था।

जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या किसी अधिकृत टोल संचालन कंपनी के कर्मचारी, अधिकारी या उससे जुड़े लोग कथित अवैध वसूली की व्यवस्था में शामिल थे।

यह भी जांच का विषय है कि अवैध ऐप बनाने, संचालित करने और टोल प्लाजा पर इनके इस्तेमाल के पीछे कौन लोग थे।

करोड़ों रुपये की अनधिकृत रसीदों का दावा

ED के अनुसार डिजिटल रिकॉर्ड की जांच में करोड़ों रुपये की अनधिकृत टोल रसीदों के संकेत मिले हैं।

जांच एजेंसी अब डिजिटल डेटा, बैंक खातों, नकद रकम और खाता-बही के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

यदि अलग-अलग टोल प्लाजा से जुड़े रिकॉर्ड आपस में जुड़े पाए जाते हैं तो जांच का दायरा और बढ़ सकता है।

सरकार को राजस्व नुकसान का आरोप

टोल वसूली से मिलने वाला राजस्व राष्ट्रीय राजमार्गों और संबंधित व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि किसी टोल प्लाजा पर वसूली गई राशि आधिकारिक सिस्टम में दर्ज नहीं होती, तो सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंच सकता है।

पुलिस की शिकायत में भी कथित फर्जी रसीदों और आधिकारिक रिकॉर्ड से जानकारी छिपाने के कारण सरकारी राजस्व को नुकसान होने की बात कही गई है।

हालांकि, वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ, इसका अंतिम आंकड़ा जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

अब जांच में किन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं?

ED की कार्रवाई के बाद इस मामले में कई महत्वपूर्ण सवाल सामने हैं:

पहला, करीब 100 टोल प्लाजा पर कथित अवैध ऐप का इस्तेमाल किस स्तर पर हुआ?

दूसरा, ‘Mabdata’ और ‘Any’ ऐप को किसने विकसित और संचालित किया?

तीसरा, इन ऐप के जरिए कुल कितनी राशि की वसूली की गई?

चौथा, कथित अनधिकृत रसीदों से कितना सरकारी राजस्व प्रभावित हुआ?

पांचवां, टोल संचालन से जुड़ी कंपनियों या उनके कर्मचारियों की इसमें क्या भूमिका थी?

छठा, वसूली गई रकम किन बैंक खातों या व्यक्तियों तक पहुंची?

सातवां, क्या यह पूरा नेटवर्क संगठित तरीके से कई राज्यों में संचालित किया जा रहा था?

इन सवालों के जवाब जांच आगे बढ़ने के साथ सामने आने की उम्मीद है।

सिर्फ टोल कर्मचारियों का मामला नहीं, नेटवर्क की तलाश

ED की कार्रवाई से संकेत मिलता है कि जांच केवल किसी एक टोल प्लाजा या कर्मचारी तक सीमित नहीं है। कई राज्यों में एक साथ तलाशी और करीब 100 टोल प्लाजा से जुड़े कथित नेटवर्क की जांच इस मामले को व्यापक बनाती है।

यदि अलग-अलग राज्यों के टोल प्लाजा पर एक जैसी तकनीक और समान ऐप का इस्तेमाल पाया जाता है तो यह किसी संगठित नेटवर्क की ओर संकेत कर सकता है।

हालांकि, किसी व्यक्ति या कंपनी की आपराधिक भूमिका जांच और अदालत में प्रमाणित होने के बाद ही अंतिम रूप से स्थापित होगी।

News for Action Bharat की नजर

टोल वसूली में FASTag जैसी डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य लेनदेन को पारदर्शी और ट्रैक करने योग्य बनाना है। ऐसे में यदि जांच एजेंसी का दावा सही साबित होता है कि अनधिकृत ऐप के जरिए आधिकारिक रिकॉर्ड से बाहर टोल वसूली की गई, तो यह डिजिटल टोल व्यवस्था की निगरानी और ऑडिट सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

ED की छापेमारी में 1.03 करोड़ रुपये नकद, वित्तीय दस्तावेज और डिजिटल उपकरण मिलने तथा आठ बैंक खातों को फ्रीज किए जाने की कार्रवाई मामले की गंभीरता को दर्शाती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि करीब 100 टोल प्लाजा तक कथित तौर पर फैले इस नेटवर्क के पीछे कौन था और टोल वसूली से कितनी रकम आधिकारिक सिस्टम से बाहर गई?

जांच पूरी होने के बाद इन सवालों के जवाब सामने आना इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर साफ करेगा।

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