धर्म डेस्क (Action Bharat) | सनातन धर्म में राधा अष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मान्यता के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री राधा रानी का प्राकट्य हुआ था। इस दिन श्रद्धालु राधा रानी की पूजा-अर्चना करने के साथ व्रत रखते हैं और श्रीजी का ध्यान, भजन-कीर्तन तथा सेवा करते हैं।
वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज ने राधा अष्टमी व्रत के नियम को लेकर बताया है कि इस व्रत का उद्देश्य केवल खान-पान पर नियंत्रण रखना नहीं, बल्कि श्री राधा रानी के प्रति प्रेम, भक्ति और समर्पण है। उन्होंने व्रत के दौरान विशेष रूप से प्रातःकाल के समय भोजन न करने और श्रीजी के ध्यान-कीर्तन पर जोर दिया है।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार कैसे रखें राधा अष्टमी व्रत?
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार राधा अष्टमी का व्रत प्रेम प्राप्ति का व्रत है। उनका कहना है कि प्रातःकालीन बेला में भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी समय राधा रानी का प्राकट्य माना जाता है।
इसके बाद श्रद्धालु विधिपूर्वक राधा रानी का अभिषेक और श्रृंगार कर सकते हैं। पूजा-अर्चना के बाद चरणामृत ग्रहण करने की परंपरा बताई गई है।
महाराज के अनुसार इसके बाद व्रत को लेकर बहुत अधिक बाहरी नियमों में उलझने की आवश्यकता नहीं है। भक्त को श्रीजी का ध्यान और लाड़ली जू का कीर्तन करना चाहिए।
सिर्फ पकवान खाना व्रत नहीं
प्रेमानंद जी महाराज ने व्रत की भावना पर जोर देते हुए कहा कि राधा अष्टमी के दिन तरह-तरह के पकवान बनाकर उनका सेवन करना व्रत की वास्तविक भावना नहीं है।
उनके अनुसार व्रत का महत्व भक्ति, संयम और राधा रानी के प्रति प्रेम में है। इसलिए इस दिन व्यक्ति को अपना अधिक से अधिक समय पूजा, ध्यान, भजन और कीर्तन में लगाना चाहिए।
2026 में कब मनाई जाएगी राधा अष्टमी?
दिए गए वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 सितंबर 2026 को दोपहर 1 बजे शुरू होगी और इसका समापन 19 सितंबर 2026 को दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर होगा।
उदया तिथि के आधार पर 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का व्रत रखा जाएगा।
हालांकि, व्रत और पूजा के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि एवं मुहूर्त की पुष्टि करना उचित माना जाता है।
राधा अष्टमी पर दान का भी महत्व
राधा अष्टमी के दिन दान-पुण्य को भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, धन या आवश्यक वस्तुओं का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और राधा रानी की कृपा प्राप्त होती है।
भक्त सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रद्धा के साथ राधा रानी की पूजा कर सकते हैं। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार मंदिर या जरूरतमंद लोगों को दान किया जा सकता है।
व्रत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
प्रेमानंद जी महाराज की बताई भावना के अनुसार राधा अष्टमी का व्रत केवल भोजन छोड़ने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मन को श्री राधा रानी की भक्ति में लगाने का अवसर है।
इस दिन भक्त को दिखावे से दूर रहकर श्रद्धा और प्रेम के साथ पूजा, ध्यान और कीर्तन करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी भाव से राधा रानी की आराधना करने पर भक्त को श्रीजी की कृपा प्राप्त होती है।
नोट: व्रत के नियम परिवार, संप्रदाय और स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रेमानंद जी महाराज के बताए विचारों पर आधारित है।
