असम (Action Bharat) | दिल्ली के सत्य निकेतन में PG इमारत गिरने से सात लोगों की मौत के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल भवन मालिकों की नहीं, बल्कि संबंधित सरकारी अधिकारियों की भी है। अगर अधिकारी अपनी कानूनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से पालन करते तो इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता था।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने दिल्ली के सभी PG और हॉस्टलों का सुरक्षा एवं ढांचागत ऑडिट कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी पूछा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार की क्या रणनीति है।
एक सप्ताह में PG और हॉस्टल का ऑडिट
हाई कोर्ट ने एमसीडी को एक सप्ताह के भीतर दिल्ली के PG और हॉस्टलों का ऑडिट करने का निर्देश दिया है। अदालत का जोर इस बात पर है कि छात्रों के रहने वाली इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा की जांच हो और किसी संभावित खतरे को समय रहते पहचाना जाए।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि निजी PG और हॉस्टलों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त दिशा-निर्देश नहीं हैं, तो तत्काल प्रभाव से उचित दिशानिर्देश तैयार किए जाने चाहिए।
सात मौतों पर अदालत ने जताई गंभीर चिंता
सत्य निकेतन हादसे में छात्रों समेत सात लोगों की मौत पर हाई कोर्ट ने गहरा दुख व्यक्त किया। अदालत ने कहा कि अपनी जिंदगी की शुरुआत करने वाले युवा छात्रों का इस तरह मलबे के नीचे दब जाना बेहद दुखद और गंभीर चिंता का विषय है।
पीठ ने कहा कि छात्रों की सुरक्षा के लिए केवल भवन मालिकों को जिम्मेदार ठहराकर सरकारी एजेंसियां अपनी भूमिका से बच नहीं सकतीं। संबंधित अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि भवन नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है।
स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका पर नोटिस
हादसे की स्वतंत्र जांच और अन्य राहत की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, एमसीडी और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है।
सभी संबंधित पक्षों को 10 दिन के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी।
पीड़ित परिवारों को एक करोड़ रुपये मुआवजे की मांग
याचिकाकर्ता अनिकेत कुमार गुप्ता की ओर से दायर जनहित याचिका में हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की गई है।
याचिका में दिल्ली के सभी PG आवासों और हॉस्टलों का व्यापक ढांचागत ऑडिट कराने की मांग भी रखी गई है, ताकि जर्जर और खतरनाक इमारतों की पहचान कर समय रहते कार्रवाई की जा सके।
कोर्ट ने पूछा- हादसे के बाद भविष्य की रणनीति क्या है?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, एमसीडी और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि बचाव अभियान और अन्य जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को बख्शा नहीं जाएगा।
इस पर अदालत ने सवाल किया कि हादसा हो चुका है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए सरकार की रणनीति क्या है?
पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल हादसे के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित एजेंसियों को पहले से यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रों के रहने वाली इमारतें सुरक्षित हों और नियमों का पालन हो रहा हो।
दो मंजिल की अनुमति, छह मंजिल तक निर्माण पर सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने अनधिकृत और लापरवाह निर्माण के तरीके पर भी गंभीर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि कई मामलों में ऐसी इमारतें सामने आती हैं जिन्हें दो मंजिल तक निर्माण की अनुमति होती है, लेकिन बाद में बिना पर्याप्त संरचनात्मक बदलाव के उन्हें कई मंजिल तक बढ़ा दिया जाता है।
अदालत ने सवाल उठाया कि अगर किसी इमारत की नींव और मूल संरचना दो मंजिल के हिसाब से तैयार की गई है तो उस पर अतिरिक्त मंजिलें बनाना कितना सुरक्षित है।
कोर्ट ने कहा कि यदि PG और निजी हॉस्टलों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नियम या दिशा-निर्देश नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल तैयार किया जाना चाहिए।
गिरी इमारत वैध थी या नहीं? MCD से जवाब मांगा
हाई कोर्ट ने एमसीडी को मामले की उच्च स्तरीय जांच करने का निर्देश दिया है। अदालत ने एमसीडी से यह पता लगाने को कहा है कि सत्य निकेतन में गिरी इमारत का निर्माण वैध अनुमति के तहत किया गया था या नहीं।
साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका और संभावित लापरवाही की भी जांच करने को कहा है। यदि किसी अधिकारी की चूक सामने आती है तो उसकी जवाबदेही तय करने और उसके खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई की जानकारी भी अदालत को देने के निर्देश दिए गए हैं।
दिल्ली सरकार से भी पूछा गया है कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
बाहर से आने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल की कमी पर भी सवाल
हाई कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय और सरकार की छात्र आवास व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आकर पढ़ाई करने वाले छात्रों को पर्याप्त हॉस्टल सुविधा उपलब्ध कराने में व्यवस्था विफल रही है।
अदालत ने दिल्ली विश्वविद्यालय को हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि:
- दिल्ली से बाहर से आने वाले कितने छात्र DU और उससे संबद्ध कॉलेजों में पढ़ रहे हैं?
- इनमें से कितने छात्रों को विश्वविद्यालय की हॉस्टल सुविधा उपलब्ध है?
- दिल्ली विश्वविद्यालय और सरकार द्वारा संचालित कुल कितने हॉस्टल हैं?
- इन हॉस्टलों में कितने छात्र रह रहे हैं?
- छात्रों के लिए उपलब्ध आवास की तुलना में जरूरत कितनी है?
PG में रहने को मजबूर छात्रों की सुरक्षा बड़ा सवाल
हाई कोर्ट की टिप्पणियों के बाद दिल्ली में छात्रों के आवास का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में ऐसे छात्र पढ़ते हैं जो दूसरे राज्यों से राजधानी आते हैं। सीमित हॉस्टल क्षमता के कारण कई छात्रों को निजी PG और किराये की इमारतों में रहना पड़ता है।
सत्य निकेतन हादसे ने इसी व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब चुनौती सिर्फ हादसे की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि दिल्ली में छात्रों के लिए उपलब्ध निजी और सरकारी आवास वास्तव में सुरक्षित हैं या नहीं।
बड़ा सवाल
सत्य निकेतन हादसे पर हाई कोर्ट की सख्ती ने सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही, भवन सुरक्षा और छात्रों के लिए सुरक्षित आवास के मुद्दे को सामने ला दिया है। अब एमसीडी के ऑडिट और सरकार व डीयू के हलफनामों से यह स्पष्ट होगा कि राजधानी में PG और हॉस्टल व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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