कौन हैं नीम करोली बाबा? क्यों कहलाते हैं कलयुग में ‘हनुमान अंश’, जानिए उनकी साधना और चमत्कारी कथाएं

धर्म-अध्यात्म

नई दिल्ली (Action Bharat) | नीम करोली बाबा भारत के उन प्रसिद्ध संतों में गिने जाते हैं, जिनके जीवन, साधना, सेवा और उनसे जुड़ी चमत्कारी कथाएं आज भी भक्तों के बीच श्रद्धा के साथ सुनाई जाती हैं। उनके अनुयायी उन्हें प्रेम से महाराज जी कहकर पुकारते थे। बाबा का जीवन साधना, भक्ति, सेवा और मानव कल्याण के लिए समर्पित बताया जाता है।

नीम करोली बाबा को विशेष रूप से भगवान हनुमान का अनन्य भक्त माना जाता है। उनकी हनुमान भक्ति और सेवा भावना इतनी गहरी थी कि उनके अनुयायी उन्हें कलयुग में ‘हनुमान अंश’ के रूप में भी श्रद्धा से याद करने लगे। उनके जीवन से जुड़ी कई कथाएं आज भी भक्तों और श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं।

कौन थे नीम करोली बाबा?

नीम करोली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के अकबरपुर गांव में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ बताया जाता है। उनका बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण था। किशोरावस्था में ही उन्होंने परिवार की संपत्ति और सुख-सुविधाओं को छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया था।

इसके बाद उनका जीवन साधना और आध्यात्मिक यात्राओं से जुड़ता चला गया। वे अलग-अलग स्थानों पर रहे और संतों से आध्यात्मिक ज्ञान तथा साधना की शिक्षा प्राप्त की।

तालाब में खड़े होकर करते थे साधना, मिला ‘तलैय्या बाबा’ नाम

बताया जाता है कि बाबा गुजरात के मौरवी के पास स्थित बबानियां गांव पहुंचे थे। यहां उन्होंने एक वैष्णव संत से करीब छह से सात वर्षों तक साधना सीखी।

इस दौरान वे लंबे समय तक तालाब में गर्दन तक पानी में डूबे रहकर साधना करते थे। उनकी इसी साधना के कारण उन्हें ‘तलैय्या बाबा’ के नाम से भी जाना जाने लगा।

भगवान हनुमान के थे अनन्य भक्त

नीम करोली बाबा के जीवन में भगवान हनुमान की भक्ति का विशेष स्थान बताया जाता है। बबानियां गांव में उन्होंने तालाब के किनारे हनुमान जी की मूर्ति स्थापित कराई थी। बाद में वहां मंदिर का निर्माण भी कराया गया।

बाबा की हनुमान भक्ति और सेवा भावना को देखते हुए उनके भक्तों में यह विश्वास गहरा हुआ कि बाबा का हनुमान जी से विशेष आध्यात्मिक संबंध था। इसी श्रद्धा के कारण उन्हें ‘हनुमान अंश’ कहकर भी याद किया जाने लगा।

कैसे पड़ा ‘नीम करौली बाबा’ नाम?

करीब वर्ष 1916 के आसपास बाबा ने बबानियां छोड़ दिया और उत्तर भारत के नीब करौरी नामक गांव पहुंचे। आगे चलकर यही गांव उनकी पहचान से जुड़ गया।

उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसिद्ध रेल प्रसंग भी इसी स्थान से संबंधित बताया जाता है। इस घटना के बाद नीब करौरी गांव का नाम व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुआ और बाबा लक्ष्मणदास को लोग ‘नीब करौरी बाबा’ कहने लगे। समय के साथ यही नाम बदलकर ‘नीम करौली बाबा’ के रूप में लोकप्रिय हुआ।

उत्तराखंड में भी बनाई अपनी अलग पहचान

वर्ष 1934-35 के बाद बाबा का भ्रमण और भक्तों से उनका जुड़ाव और अधिक बढ़ा। वे किसी एक स्थान पर लंबे समय तक नहीं रुकते थे। उत्तराखंड में भी उन्होंने कई स्थानों को साधना और सेवा से जोड़ा।

कैंची धाम, वृंदावन, हनुमानगढ़ और भूमियाधार जैसे स्थानों से उनका विशेष संबंध बताया जाता है। इनमें कैंची धाम आज भी नीम करोली बाबा से जुड़े सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थलों में माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

‘राम नाम’ में थी गहरी आस्था

नीम करोली बाबा का जीवन बेहद सादगीपूर्ण बताया जाता है। वे दिखावे से दूर रहते थे और लोगों को भगवान का नाम लेने, सेवा करने तथा जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते थे।

उनकी साधना में ‘राम नाम’ का विशेष महत्व बताया जाता है। वे अक्सर राम नाम लिखते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे भक्ति को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि मानव सेवा को भी ईश्वर की सेवा का ही एक रूप मानते थे।

नीम करोली बाबा के चमत्कारों की आज भी होती है चर्चा

नीम करोली बाबा से जुड़े कई चमत्कारी प्रसंग भक्तों के बीच आज भी प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि वे कई बार लोगों की समस्याओं को बिना उनके बताए समझ लेते थे और ऐसी बातें कहते थे, जिन्हें सुनकर उनके अनुयायी आश्चर्यचकित रह जाते थे।

इन घटनाओं में सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक रेल यात्रा से जुड़ी घटना है। कथा के अनुसार, बाबा एक बार बिना टिकट ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में बैठ गए। टिकट जांच के दौरान उनके पास टिकट नहीं मिला तो उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया।

कहा जाता है कि बाबा को उतारने के बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। काफी प्रयास के बावजूद ट्रेन नहीं चली। इसके बाद बाबा को दोबारा ट्रेन में बैठाने का आग्रह किया गया और उनके ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन आगे चल पड़ी। यह घटना बाबा से जुड़ी प्रमुख चमत्कारी कथाओं में गिनी जाती है।

11 सितंबर 1973 को वृंदावन में ली समाधि

नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन के राम कृष्ण मिशन अस्पताल में शरीर त्याग दिया।

उनके निधन के बाद भी उनके अनुयायियों की श्रद्धा कम नहीं हुई। कैंची धाम और अन्य आश्रमों में आज भी बाबा को गुरु, मार्गदर्शक और हनुमान भक्त के रूप में याद किया जाता है। भक्तों के लिए उनका जीवन भक्ति, सेवा, सादगी और मानव कल्याण का संदेश देने वाला माना जाता है।

क्यों याद किए जाते हैं नीम करोली बाबा?

नीम करोली बाबा का प्रभाव केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहा। उनकी शिक्षाओं में भक्ति के साथ सेवा और मानव कल्याण को विशेष महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि आज भी देश-विदेश में उनके अनुयायी उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं।

भगवान हनुमान के प्रति उनकी गहरी आस्था, सादगीपूर्ण जीवन और उनसे जुड़ी चमत्कारी कथाओं ने उन्हें भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

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