नई दिल्ली | न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सोमवार को आयोजित एक व्याख्यान में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे और राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने कहा कि न्यायपालिका में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।
इस दौरान जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर कथित तौर पर जलते हुए कैश मिलने की घटना का भी उल्लेख हुआ। महेश जेठमलानी ने सवाल उठाया कि इस मामले में FIR क्यों दर्ज नहीं की गई। उन्होंने यह सवाल उस संदर्भ में उठाया जब जस्टिस वर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट से जांच को रद्द करने की मांग किए जाने का भी जिक्र किया गया।
हरीश साल्वे ने भी उठाए सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस मामले को दूसरे संवैधानिक पदों और आम नागरिकों के संदर्भ में रखकर सवाल किया। उन्होंने पूछा कि यदि ऐसी ही घटना किसी मंत्री के घर पर हुई होती, तो क्या FIR दर्ज होने से बचा जा सकता था?
साल्वे ने यह भी सवाल उठाया कि अगर न्यायपालिका से बाहर किसी व्यक्ति के घर में ऐसी घटना सामने आती और उस मामले को लेकर जनहित याचिका दाखिल होती, तो न्यायपालिका का रुख क्या होता।
न्यायपालिका में पारदर्शिता की जरूरत
महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि संस्थागत व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए शिकायतों और गंभीर आरोपों से निपटने की प्रक्रिया प्रभावी और स्पष्ट होनी चाहिए।
वहीं, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने इसी कार्यक्रम में न्यायपालिका के खिलाफ जायज और रचनात्मक आलोचना को लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि किसी संस्था के लिए सुधार जरूरी है और “सुधार ही नियम होना चाहिए।”
CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका की शिकायत व्यवस्था पर क्या कहा?
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा बनाया गया तंत्र मजबूत है और तेजी से प्रतिक्रिया देने के साथ समय पर काम करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि हर मुद्दे पर सार्वजनिक मंच से प्रतिक्रिया देना उचित नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही हो सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, जानकारीपूर्ण और रचनात्मक आलोचना संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार में योगदान देती है।
पारदर्शिता का मतलब सिर्फ खुली अदालत नहीं
CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में पारदर्शिता की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अर्थ केवल अदालतों के दरवाजे खुले रखना या सार्वजनिक सुनवाई करना नहीं है।
उनके मुताबिक, पारदर्शिता का अर्थ यह भी है कि किसी न्यायिक फैसले के पीछे मौजूद कारणों को लोग समझ और देख सकें। यानी न्यायिक प्रक्रिया में फैसलों के आधार को लेकर भी स्पष्टता जरूरी है।
‘फिक्सर वकीलों’ की भूमिका पर जेठमलानी का गंभीर आरोप
महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका और न्यायाधिकरणों में भ्रष्टाचार के संदर्भ में “फिक्सर वकीलों” की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि कानूनी व्यवस्था में भ्रष्टाचार तब तक संभव नहीं है जब तक ऐसे वकील मौजूद न हों जो पूरी कानूनी प्रणाली को रिश्वत के जरिए प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
उन्होंने कहा कि बार में ऐसे लोगों के बारे में जानकारी होने की बात कही जाती है और उनके नाम संभवतः खुफिया एजेंसियों के पास भी हो सकते हैं। जेठमलानी ने सुझाव दिया कि ऐसी जानकारी सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम तक पहुंचाई जानी चाहिए।
बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
जेठमलानी ने बार काउंसिलों की कार्यप्रणाली की भी आलोचना की। उन्होंने विशेष रूप से बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के कार्यकाल को पांच साल बढ़ाने के प्रयास का उल्लेख करते हुए सवाल उठाए।
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले का उल्लेख ऐसे समय में हुआ है जब न्यायपालिका में जवाबदेही, शिकायतों की जांच और संस्थागत पारदर्शिता को लेकर बहस जारी है। एक ओर वरिष्ठ अधिवक्ता गंभीर सवालों और अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, वहीं CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में सुधार और रचनात्मक आलोचना को संस्थागत आत्म-सुधार का हिस्सा बताया है।
हालांकि, उपलब्ध सामग्री में जस्टिस वर्मा के मामले में FIR दर्ज न होने का कोई आधिकारिक कारण नहीं दिया गया है। इसलिए FIR क्यों नहीं हुई, इसका अंतिम निष्कर्ष उपलब्ध स्रोत के आधार पर निकालना उचित नहीं होगा। उपलब्ध खबर में यह मुद्दा महेश जेठमलानी और हरीश साल्वे द्वारा उठाए गए सवाल के रूप में सामने आया है।
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