वॉशिंगटन | Action Bharat | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को मेल-इन वोटिंग के मुद्दे पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के उस प्रस्ताव को प्रभावी होने से रोक दिया है, जिसके तहत देशभर में मतदाताओं को भेजे जाने वाले मेल बैलेट की प्रक्रिया में बदलाव किया जाना था।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका में मिड-टर्म इलेक्शन की तैयारियां चल रही हैं। चुनाव अधिकारियों ने पहले ही आशंका जताई थी कि यदि नए नियमों को इसी चुनाव में लागू किया गया, तो इससे चुनावी प्रक्रिया में भारी अव्यवस्था पैदा हो सकती है और बड़ी संख्या में मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित हो सकते हैं।
क्या था ट्रंप प्रशासन का प्रस्ताव?
ट्रंप प्रशासन ने मेल बैलेट से जुड़े पोस्टल नियमों में बदलाव को एक अपेक्षाकृत सीमित प्रशासनिक कदम के तौर पर पेश किया था। सरकार का तर्क था कि इस बदलाव का उद्देश्य मेल वोटिंग में कथित धोखाधड़ी की आशंका को कम करना था।
लेकिन ट्रंप के आलोचकों ने इस प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि इसके जरिए राष्ट्रपति प्रशासन चुनाव प्रक्रिया में ऐसी शक्ति हासिल करने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त आधार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने तीन वाक्यों वाले, बिना हस्ताक्षर के आदेश में ट्रंप प्रशासन की चुनौती को आगे बढ़ने से रोक दिया।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासन के अपनी चुनौती के आधार पर सफल होने की संभावना कम है। हालांकि, आदेश में इस फैसले के विस्तृत कानूनी कारण नहीं बताए गए।
फैसले से कंजर्वेटिव जज सैमुअल एलिटो और क्लेरेंस थॉमस असहमत रहे।
मिड-टर्म चुनाव पर क्या असर?
इस फैसले का तत्काल महत्व इसलिए भी है क्योंकि प्रस्तावित बदलाव को इसी साल होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनाव में लागू किए जाने की संभावना थी।
अब उपलब्ध जानकारी के अनुसार:
- मेल बैलेट भेजने की मौजूदा प्रक्रिया में प्रस्तावित बदलाव लागू नहीं होगा।
- चुनाव अधिकारियों को अचानक नई व्यवस्था लागू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
- लाखों मतदाताओं के मेल बैलेट पर इसका तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
- चुनाव अधिकारियों द्वारा जताई गई संभावित अव्यवस्था और मतदाताओं के वोट से वंचित होने की आशंका फिलहाल टल गई है।
चुनाव अधिकारियों ने क्यों जताई थी चिंता?
इस प्रस्ताव को लेकर केवल ट्रंप के राजनीतिक विरोधियों ने ही सवाल नहीं उठाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, GOP से जुड़े कुछ चुनाव अधिकारियों ने भी चेतावनी दी थी कि नई व्यवस्था को जल्द लागू करने से चुनाव प्रक्रिया में अफरा-तफरी पैदा हो सकती है।
उनकी चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर थी कि बदलाव के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को समय पर अपना मेल बैलेट नहीं मिल पाएगा या वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत वोट नहीं डाल पाएंगे।
ट्रंप और मेल वोटिंग का पुराना विवाद
मेल-इन वोटिंग को लेकर ट्रंप लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर चुनावी धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं, हालांकि मेल वोटिंग को लेकर उनके रुख को लेकर राजनीतिक विवाद भी लगातार रहा है।
इस मामले में ट्रंप प्रशासन का कहना था कि नियमों में बदलाव चुनावी सुरक्षा के लिए जरूरी है, जबकि आलोचकों ने इसे चुनावी प्रक्रिया पर कार्यपालिका का अनुचित प्रभाव बढ़ाने की कोशिश बताया।
US Postal Service की भूमिका भी सवालों में
प्रस्ताव के आलोचकों की एक बड़ी चिंता US Postal Service को लेकर भी थी। उनका कहना था कि प्रस्ताव लागू होने की स्थिति में डाक सेवा को लाखों मेल बैलेट के संबंध में असाधारण अधिकार और जिम्मेदारी मिल सकती थी।
आलोचकों के अनुसार, US Postal Service इस बड़े बदलाव को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी। ऐसे में चुनाव के दौरान प्रशासनिक और तकनीकी समस्याएं पैदा होने की आशंका थी।
बड़ा सवाल
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला फिलहाल मौजूदा मेल-इन वोटिंग व्यवस्था को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इस आदेश से मेल वोटिंग पर अमेरिका में चल रही व्यापक राजनीतिक और कानूनी बहस खत्म नहीं हुई है।
मुख्य सवाल यही है कि चुनावी सुरक्षा और मतदाताओं की मतदान तक आसान पहुंच के बीच अमेरिका किस तरह संतुलन बनाएगा?
नोट: इस खबर में ट्रंप प्रशासन और उसके आलोचकों के तर्कों को संबंधित पक्षों के दावों/आरोपों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उपलब्ध सामग्री में सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत कानूनी तर्कों का पूरा विवरण नहीं दिया गया है।
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