नई दिल्ली | Action Bharat | देश में चावल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। कम बारिश और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग के बीच भारतीय चावल की कीमतें करीब एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। ऐसे समय में जब खाद्य वस्तुओं की कीमतें पहले से ही आम उपभोक्ताओं के बजट पर दबाव बना रही हैं, चावल के महंगे होने से घरेलू खर्च और बढ़ने की आशंका है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चावल की कीमतों में तेजी के पीछे खरीफ सीजन की फसल को लेकर बढ़ती चिंता, घरेलू सप्लाई में कमी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत मांग जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं।
एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंची कीमतें
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 5 प्रतिशत टूटे हुए उसना (Parboiled) चावल की कीमत बढ़कर 371-377 डॉलर प्रति टन हो गई है। पिछले सप्ताह यही कीमत 369-375 डॉलर प्रति टन थी।
वहीं, 5 प्रतिशत टूटे हुए सफेद चावल की कीमत 368-373 डॉलर प्रति टन के बीच पहुंच गई है।
रिपोर्ट में इन कीमतों को पिछले एक साल का उच्चतम स्तर बताया गया है।
कीमतों में तेजी की बड़ी वजहें
- 🌧️ कम बारिश और कमजोर मानसून
- 🌾 खरीफ धान की फसल को लेकर चिंता
- 📉 घरेलू सप्लाई में कमी की आशंका
- 🌍 अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की बढ़ती मांग
- 🚢 कुछ देशों द्वारा चावल का आयात बढ़ाना
ग्लोबल डिमांड भी बढ़ी
चावल की कीमतों पर सिर्फ घरेलू परिस्थितियों का असर नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है।
थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रमुख चावल निर्यातक देशों में भी कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। वहीं, फिलीपींस समेत कई देशों ने चावल का आयात बढ़ाया है, जिससे वैश्विक मांग में तेजी आई है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत के सरकारी गोदामों में चावल का भंडार अभी रिकॉर्ड स्तर पर बताया गया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी और घरेलू सरकारी भंडार की स्थिति के बीच बाजार किस दिशा में जाता है, यह महत्वपूर्ण होगा।
कम बारिश बनी सबसे बड़ी चिंता
रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में देश में सामान्य से 16 प्रतिशत कम बारिश हुई। मौसम विभाग की ओर से सितंबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान बताया गया है।
कम बारिश का सीधा असर धान की खेती पर पड़ने की आशंका है। कई बिजनेस हाउसों ने बारिश की कमी को देखते हुए फसल उत्पादन के अनुमान में कमी की है। इसका असर चावल की कीमतों पर दिखाई देने की बात कही जा रही है।
धान की खेती वाले कई राज्यों में कमजोर मानसून के कारण बुवाई भी प्रभावित होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार खरीफ फसलों का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में कम रहा है और इसमें धान का क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हुआ है।
आम आदमी की जेब पर कितना असर?
चावल भारत के करोड़ों परिवारों के रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा है। इसलिए इसकी कीमत में लगातार तेजी का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि आने वाले कुछ सप्ताह में मानसून की स्थिति और खरीफ फसल का अंतिम उत्पादन अनुमान चावल बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
अगर बारिश की कमी बनी रहती है और उत्पादन अनुमान और नीचे आते हैं, तो घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात बाजार में भी कीमतों के ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंका जताई गई है।
सरकार के सामने भी चुनौती
एक तरफ चावल की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ रही है और दूसरी तरफ कमजोर मानसून फसल को लेकर चिंता पैदा कर रहा है। हालांकि सरकारी गोदामों में रिकॉर्ड भंडार होने की बात कही गई है।
ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल होंगे—
- क्या सरकारी भंडार बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद करेगा?
- क्या मानसून में सुधार से धान की फसल को राहत मिलेगी?
- खरीफ उत्पादन का अंतिम अनुमान क्या रहेगा?
- क्या घरेलू बाजार में चावल की कीमतें और बढ़ेंगी?
फिलहाल चावल बाजार की अगली दिशा बारिश, खरीफ उत्पादन और वैश्विक मांग के बीच संतुलन पर निर्भर करती दिखाई दे रही है।
Action Bharat | खबर वही, सवाल जरूरी।
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