‘पार्टी चोरी’ का आरोप लगाने से पहले कांग्रेस का इतिहास देखें राहुल: BJP ने गिनाए सरकार गिराने और दलों में फूट के उदाहरण

राजनीति

नई दिल्ली (Action Bharat) | तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘सरकार चोरी’ और ‘पार्टी चोरी’ वाले आरोपों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पलटवार किया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी से कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास को देखने की बात कहते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान कई विपक्षी दलों में विभाजन हुआ और कुछ राज्यों की निर्वाचित सरकारों को भी हटाया गया।

यह विवाद उस समय सामने आया है जब चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे संगठनात्मक विवाद के बीच दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को फिलहाल वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने को कहा है। इस फैसले पर राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और भाजपा पर सवाल उठाते हुए इसे ‘पार्टी चोरी’ से जोड़ा था।

राहुल गांधी ने क्या कहा था?

राहुल गांधी ने 18 सितंबर को TMC के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा और चुनाव आयोग पर विपक्षी दलों को कमजोर करने के आरोप लगाए।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राहुल गांधी ने इस घटनाक्रम को अपने पहले के ‘वोट चोरी’ और ‘सरकार चोरी’ वाले आरोपों से जोड़ते हुए ‘पार्टी चोरी’ की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि यह केवल ममता बनर्जी या TMC का मुद्दा नहीं है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक दलों की पहचान से जुड़ा व्यापक सवाल है।

राहुल गांधी के अनुसार, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) से जुड़े पिछले विवादों के बाद TMC को लेकर भी उन्हें एक समान पैटर्न दिखाई देता है। ये उनके राजनीतिक आरोप हैं; भाजपा और चुनाव आयोग ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।

भाजपा ने क्या पलटवार किया?

भाजपा मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि राहुल गांधी को भाजपा पर आरोप लगाने से पहले कांग्रेस के इतिहास को देखना चाहिए।

त्रिवेदी ने विशेष रूप से उन केंद्र सरकारों का उल्लेख किया जिन्हें कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बाद सत्ता से बाहर होना पड़ा था। उन्होंने चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवेगौड़ा और आई.के. गुजराल के नेतृत्व वाली सरकारों का उदाहरण दिया।

त्रिवेदी ने राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उन्हें अपनी पार्टी का इतिहास ही पता नहीं है, तो उन्हें पहले कांग्रेस के इतिहास को समझना चाहिए।

भाजपा ने कांग्रेस के इतिहास के किन घटनाक्रमों का जिक्र किया?

सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास के कई उदाहरण गिनाए। इनमें से कुछ घटनाओं को लेकर उनका दावा राजनीतिक बहस का हिस्सा है और उन्हें भाजपा के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

1. 1959 में केरल की सरकार का मामला

त्रिवेदी ने 1959 में केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली सरकार को हटाए जाने का उदाहरण दिया।

उन्होंने इसे कांग्रेस द्वारा विपक्षी सरकार को हटाए जाने के उदाहरण के तौर पर पेश किया।

2. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का उल्लेख

भाजपा प्रवक्ता ने दावा किया कि 1963 में कांग्रेस ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को खत्म करने की दिशा में भूमिका निभाई।

यह उदाहरण देते हुए उन्होंने कांग्रेस के उस दौर के राजनीतिक प्रभाव और विपक्षी दलों के साथ उसके संबंधों पर सवाल उठाया।

3. नेशनल कॉन्फ्रेंस में विभाजन का आरोप

त्रिवेदी ने 1984 में नेशनल कॉन्फ्रेंस में फूट का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, कांग्रेस ने उस समय पार्टी के भीतर विभाजन कराने में भूमिका निभाई।

4. एन.टी. रामाराव सरकार का मामला

भाजपा ने आंध्र प्रदेश के तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने एन.टी. रामाराव की सरकार को उस समय गिराया, जब वह इलाज के लिए राज्य से बाहर गए थे।

यह घटना लंबे समय से भारतीय राजनीति में केंद्र-राज्य संबंध और निर्वाचित सरकारों की स्थिरता को लेकर होने वाली बहस में उद्धृत की जाती रही है।

5. कर्पूरी ठाकुर की पार्टी में फूट का आरोप

त्रिवेदी ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से जुड़ी लोक दल की राजनीति का भी उदाहरण दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने उस दौर में लोक दल में विभाजन कराने की भूमिका निभाई।

6. एस.आर. बोम्मई सरकार का मामला

भाजपा प्रवक्ता ने 1989 में कर्नाटक की एस.आर. बोम्मई सरकार को हटाए जाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय विधानसभा में बोम्मई के दल के पास बहुमत था।

बोम्मई प्रकरण बाद में भारतीय संवैधानिक कानून में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मामले के रूप में सामने आया, जिसमें केंद्र द्वारा राज्य सरकारों को अनुच्छेद 356 के तहत हटाने की शक्ति और उसके न्यायिक परीक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित हुए।

चार प्रधानमंत्रियों की सरकारों का भी दिया उदाहरण

सुधांशु त्रिवेदी ने केवल राज्यों की सरकारों का ही उल्लेख नहीं किया, बल्कि केंद्र की उन सरकारों का भी जिक्र किया जिन्हें कांग्रेस के समर्थन या उसके वापस लेने से जुड़े घटनाक्रमों का सामना करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने अलग-अलग समय में समर्थन वापस लेकर:

  • चौधरी चरण सिंह की सरकार,
  • चंद्रशेखर की सरकार,
  • एच.डी. देवेगौड़ा की सरकार और
  • आई.के. गुजराल की सरकार

को प्रभावित किया।

यहां भाजपा का तर्क यह है कि राहुल गांधी द्वारा मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम को ‘सरकार चोरी’ या ‘पार्टी चोरी’ के रूप में पेश करने से पहले कांग्रेस के अपने राजनीतिक अतीत को भी चर्चा में शामिल किया जाना चाहिए।

BJP ने अपने संगठनात्मक इतिहास का भी किया उल्लेख

त्रिवेदी ने भाजपा और उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के संगठनात्मक इतिहास का भी हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि भाजपा देश की ऐसी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में है, जिसका कभी पूरी तरह से विभाजन नहीं हुआ।

उनका कहना था कि जब भी कांग्रेस ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला किया, तब भाजपा और भारतीय जनसंघ ने उन मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।

यह भाजपा प्रवक्ता का राजनीतिक दावा है और इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

TMC विवाद से शुरू हुई नई राजनीतिक बहस

पूरी राजनीतिक बहस की शुरुआत तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद से हुई है।

चुनाव आयोग ने TMC के भीतर दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच विवाद के मद्देनजर पार्टी के मूल नाम और पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाई है। दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों के लिए अलग नाम और चुनाव चिह्न चुनने को कहा गया है।

रिपोर्टों के मुताबिक, ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है, जबकि दूसरे गुट को अलग नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है।

इस फैसले को लेकर ममता बनर्जी पक्ष ने कानूनी चुनौती भी दी है और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।

राहुल गांधी बनाम भाजपा: विवाद का केंद्र क्या है?

मौजूदा राजनीतिक विवाद में दोनों पक्षों के तर्क अलग हैं।

राहुल गांधी और कांग्रेस का पक्ष:

  • TMC के नाम और चिह्न पर चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल।
  • भाजपा और चुनाव आयोग के बीच कथित मिलीभगत का आरोप।
  • इसे विपक्षी दलों की राजनीतिक पहचान से जोड़ना।
  • ‘वोट चोरी’, ‘सरकार चोरी’ और ‘पार्टी चोरी’ जैसे राजनीतिक नारों के जरिए मुद्दा उठाना।

भाजपा का पक्ष:

  • राहुल गांधी को कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास को देखने की सलाह।
  • पूर्व में विपक्षी सरकारों और दलों से जुड़े घटनाक्रमों का उल्लेख।
  • कांग्रेस पर सरकारों को समर्थन वापस लेकर गिराने और विपक्षी दलों में विभाजन की भूमिका निभाने के आरोप।
  • TMC स्वयं कांग्रेस से अलग होकर बनी पार्टी है, इस ऐतिहासिक तथ्य को राजनीतिक बहस में सामने रखना।

आगे क्या?

TMC के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला अब राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। ममता बनर्जी पक्ष ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी आयोग के निर्णय पर सवाल उठाए हैं।

दूसरी ओर, भाजपा ने इस पूरे विवाद को कांग्रेस के पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड से जोड़कर राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया है। ऐसे में TMC के चुनाव चिह्न विवाद के साथ-साथ कांग्रेस और भाजपा के बीच पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों की व्याख्या को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

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