कोपेनहेगन (Action Bharat) | यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के साथ संभावित सीधे टकराव की आशंका को देखते हुए यूरोप में सैन्य और नागरिक स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में NATO के 32 सदस्य देशों के रक्षा प्रमुखों की दो दिवसीय बैठक हो रही है। बैठक में रूस से संभावित खतरे के बीच सैन्य तैयारी, रक्षा तकनीक में निवेश और यूक्रेन को सैन्य सहायता जारी रखने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।
इस बदलते सुरक्षा माहौल का असर केवल सेनाओं तक सीमित नहीं है। कई यूरोपीय देश रक्षा बजट बढ़ाने, सैन्य उत्पादन क्षमता मजबूत करने, नागरिकों को आपातकालीन तैयारी के लिए तैयार करने और पुराने बंकरों को दोबारा इस्तेमाल करने जैसे कदम उठा रहे हैं।
NATO 3.0 के पीछे क्या है वजह?
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की ओर से यूरोपीय देशों पर अपनी सुरक्षा के लिए अधिक खर्च और जिम्मेदारी उठाने का दबाव बढ़ने के बाद NATO की रणनीतिक दिशा में बदलाव आया है। इसी नए ढांचे को रिपोर्ट में ‘NATO 3.0’ कहा गया है।
मौजूदा सैन्य खर्च में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 57 प्रतिशत बताई गई है। नए ढांचे का उद्देश्य यूरोपीय देशों को अपनी सामूहिक सुरक्षा में अधिक योगदान देने के लिए तैयार करना है।
इसके साथ ही अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन से जुड़ी चुनौतियों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेगा।
हालांकि, NATO के यूरोप में सर्वोच्च सैन्य कमांडर का पद अमेरिकी अधिकारी के पास ही रहेगा और ब्रिटेन तथा फ्रांस की स्वतंत्र परमाणु क्षमताएं भी बनी रहेंगी।
2035 तक GDP का 5 प्रतिशत रक्षा और सुरक्षा पर खर्च
NATO देशों ने वर्ष 2035 तक अपनी GDP का 5 प्रतिशत रक्षा और सुरक्षा से जुड़े खर्चों पर लगाने का लक्ष्य तय किया है।
इस प्रस्तावित हिस्सेदारी को दो भागों में बांटा गया है—
- 3.5 प्रतिशत प्रत्यक्ष सैन्य जरूरतों पर खर्च किया जाना है।
- 1.5 प्रतिशत सुरक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च करने का लक्ष्य है।
इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए यूरोपीय देशों को अपने बजट में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।
रक्षा खर्च बढ़ाने का असर स्वास्थ्य और कल्याणकारी योजनाओं पर
रक्षा बजट बढ़ाने की जरूरत का असर दूसरे सरकारी खर्चों पर भी पड़ने की चर्चा है।
रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड्स जैसे देशों में स्वास्थ्य और कल्याणकारी योजनाओं में कटौती के प्रस्ताव सामने आए हैं। इसके अलावा अतिरिक्त टैक्स के माध्यम से हर साल करीब 54 हजार करोड़ रुपये जुटाने की योजना का भी उल्लेख किया गया है।
इससे यूरोपीय देशों के सामने एक बड़ी चुनौती सामने आती है—बढ़ते सुरक्षा खर्च और सामाजिक कल्याण योजनाओं के बीच संतुलन बनाना।
जर्मनी में पुराने मेडिकल बंकर फिर होंगे तैयार
रूस के साथ संभावित संघर्ष की स्थिति में नागरिकों और घायल सैनिकों के लिए चिकित्सा व्यवस्था को लेकर भी तैयारी की जा रही है।
जर्मनी में 1979 से बंद पड़े मेडिकल बंकरों को दोबारा सक्रिय करने की तैयारी की जा रही है।
इन बंकरों का उद्देश्य आपात स्थिति या युद्ध जैसी परिस्थितियों में चिकित्सा सेवाओं के लिए वैकल्पिक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना है।
ब्रिटेन बढ़ाएगा हथियार उत्पादन
ब्रिटेन ने भी अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार—
- ब्रिटेन गोला-बारूद और विस्फोटक बनाने वाली 6 नई फैक्ट्रियां स्थापित करेगा।
- देश करीब 7,000 स्वदेशी लंबी दूरी के हथियार खरीदने की योजना पर काम कर रहा है।
इसका उद्देश्य युद्ध की स्थिति में बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता कम करना और घरेलू हथियार उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है।
पोलैंड में हर साल एक लाख लोगों को सैन्य प्रशिक्षण
पोलैंड ने नागरिक स्तर पर सैन्य तैयारी बढ़ाने की योजना बनाई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2027 से हर साल करीब एक लाख नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है। पांच वर्षों में यह संख्या करीब 5 लाख लोगों तक पहुंच सकती है।
यह योजना रूस के साथ संभावित सुरक्षा तनाव के बीच देश की नागरिक-सैन्य तैयारी बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है।
लिथुआनिया और स्वीडन में भी तैयारी तेज
अन्य यूरोपीय देशों ने भी अपनी-अपनी तैयारियां बढ़ाई हैं।
लिथुआनिया
लिथुआनिया में करीब 5,000 युवाओं को अनिवार्य सैन्य सेवा के लिए बुलाने की योजना का उल्लेख किया गया है।
स्वीडन
स्वीडन ने नागरिकों को आपात स्थिति के लिए तैयार रहने को कहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, लोगों को कम से कम 7 दिनों की जरूरी तैयारी रखने का निर्देश दिया गया है।
इसमें आपात स्थिति के दौरान भोजन, पानी और अन्य आवश्यक जरूरतों की उपलब्धता सुनिश्चित करना शामिल है।
यूरोप की अमेरिकी हथियारों पर निर्भरता कितनी?
यूरोप के सामने एक और बड़ी चुनौती हथियारों की आपूर्ति को लेकर है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2016-20 की तुलना में यूरोप में हथियारों का आयात 143 प्रतिशत बढ़ा है।
कई यूरोपीय देश हथियारों के लिए अमेरिका पर काफी निर्भर हैं।
रिपोर्ट में अमेरिका से हथियार आयात की हिस्सेदारी इस प्रकार बताई गई है—
- नॉर्वे और इटली — 93 प्रतिशत
- नीदरलैंड्स — 89 प्रतिशत
- ब्रिटेन — 85 प्रतिशत
- डेनमार्क — 82 प्रतिशत
इन आंकड़ों के चलते यूरोप में अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता और सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर बढ़ा है।
यूरोप में क्यों बढ़ रही है इतनी तैयारी?
यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए सिरे से विचार करना शुरू किया है। रूस के साथ संभावित व्यापक टकराव की स्थिति में केवल सैनिकों और हथियारों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि अस्पतालों, बंकरों, हथियार कारखानों, परिवहन व्यवस्था और नागरिकों की आपातकालीन तैयारी की भी जरूरत होगी।
इसी वजह से यूरोप में तैयारियां कई स्तरों पर दिखाई दे रही हैं—
- रक्षा बजट में वृद्धि
- घरेलू हथियार उत्पादन का विस्तार
- सैन्य प्रशिक्षण में बढ़ोतरी
- पुराने बंकरों का पुन: उपयोग
- नागरिकों के लिए आपातकालीन तैयारी
- सैन्य और सुरक्षा बुनियादी ढांचे में निवेश
- अमेरिकी हथियारों पर निर्भरता कम करने की कोशिश
हालांकि, इन कदमों का मतलब यह नहीं है कि रूस और NATO के बीच सीधे युद्ध की स्थिति बन चुकी है। फिलहाल ये कदम संभावित सुरक्षा खतरों के लिए तैयारी के रूप में सामने आ रहे हैं।
Action Bharat | World Desk
