वाशिंगटन (Action Bharat) | ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में जारी चुनौतियों के बावजूद फारस की खाड़ी के अरब देश अपने कच्चे तेल का निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर के करीब वापस लाने में सफल रहे हैं। इसके लिए खाड़ी देशों ने होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भरता कम करते हुए पाइपलाइनों, वैकल्पिक बंदरगाहों और समुद्री ट्रांसफर नेटवर्क का इस्तेमाल बढ़ाया है।
टैंकर ट्रैकिंग संस्था केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, 1 से 28 सितंबर के बीच रोजाना करीब 1.65 करोड़ बैरल कच्चे तेल और कंडेनसेट का निर्यात हुआ। यह मात्रा युद्ध से पहले के औसत के आसपास बताई गई है। हालांकि कुल निर्यात का करीब 60 प्रतिशत अभी भी होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजर रहा है।
40 प्रतिशत तेल अब वैकल्पिक रास्तों से
होर्मुज पर दबाव बढ़ने के बाद करीब 40 प्रतिशत तेल अब जमीनी पाइपलाइनों और दूसरे बंदरगाहों के जरिए भेजा जा रहा है। युद्ध से पहले वैकल्पिक मार्गों की हिस्सेदारी करीब 17 प्रतिशत थी।
सऊदी अरब ने लाल सागर तक जाने वाली पाइपलाइनों का इस्तेमाल बढ़ाया है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात ने फुजैरा बंदरगाह तक पहुंचने वाली पाइपलाइन व्यवस्था पर ज्यादा निर्भरता बढ़ाई है।
टैंकरों का नया नेटवर्क
खाड़ी देशों ने करीब 63 बहुत बड़े तेल टैंकरों का एक नेटवर्क तैयार किया है। इन टैंकरों का इस्तेमाल होर्मुज के भीतर से तेल लाकर फुजैरा के आसपास बड़े जहाजों में ट्रांसफर करने के लिए किया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी वायु और नौसैनिक बल भी क्षेत्र में जहाजों की सुरक्षा में भूमिका निभा रहे हैं। संभावित ड्रोन, मिसाइल और अन्य हमलों से बचाव के लिए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है।
निर्यात बहाल, लेकिन लागत बढ़ी
तेल निर्यात जारी रखने के बावजूद खाड़ी देशों के सामने लागत और सुरक्षा बड़ी चुनौती बनी हुई है। बीमा, टैंकरों का बढ़ा किराया, शटल ट्रांसफर और सैन्य सुरक्षा पर होने वाला खर्च तेल की कुल लागत बढ़ा रहा है।
इराक जैसे कुछ देशों को अंतरराष्ट्रीय बाजार कीमतों की तुलना में करीब 34.5 से 37 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट देकर तेल बेचने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
तेल की कीमतें अभी भी ऊंची क्यों?
तेल निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंचने के बावजूद बाजार में कीमतों पर दबाव बना हुआ है। इसकी बड़ी वजह यह आशंका है कि संघर्ष दोबारा बढ़ सकता है और होर्मुज स्ट्रेट में फिर से बड़ी रुकावट पैदा हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक तेल भंडार से 50 करोड़ बैरल से अधिक तेल निकाला जा चुका है। वहीं डीजल, जेट फ्यूल और गैस का निर्यात अभी भी सामान्य स्तर से काफी नीचे बताया जा रहा है।
ईरान पर क्या असर?
ईरान के लिए स्थिति और कठिन बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्री नाकेबंदी और होर्मुज से जुड़े प्रतिबंधों के चलते ईरान का तेल निर्यात लगभग ठप हो गया है। दूसरी ओर, अरब खाड़ी देश वैकल्पिक मार्गों के जरिए अपने तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार, यह व्यवस्था अभी सामान्य स्थिति का विकल्प नहीं बनी है। सुरक्षा खर्च, परिवहन लागत, रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की कमी और संभावित सैन्य तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना रह सकता है।
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