बेंगलुरु (Action Bharat) | कर्नाटक में लोकप्रिय डेयरी ब्रांड नंदिनी दूध की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी की तैयारी है। राज्य कैबिनेट ने दूध की कीमत में ₹8 प्रति लीटर तक की वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि विधान परिषद चुनावों के चलते लागू आचार संहिता के कारण सरकार फिलहाल इसकी औपचारिक घोषणा नहीं कर सकती।
सरकार अब चुनाव आयोग से अनुमति लेने की प्रक्रिया में है। अनुमति मिलने के बाद नई दरों को लागू किया जा सकता है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, नई कीमतें 1 नवंबर से लागू होने की संभावना है। अंतिम बढ़ोतरी कितनी होगी, इसका फैसला मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की अध्यक्षता में होने वाली अगली कैबिनेट बैठक में किया जा सकता है।
पांचवीं बार बढ़ेंगे नंदिनी दूध के दाम
अगर पूरी ₹8 प्रति लीटर की बढ़ोतरी लागू होती है तो हाल के वर्षों में नंदिनी दूध की कीमतों में यह पांचवीं वृद्धि होगी।
इससे पहले—
- मार्च 2025: ₹4 प्रति लीटर की बढ़ोतरी
- जून 2024: ₹2 प्रति लीटर की बढ़ोतरी, हालांकि ग्राहकों को 50 मिलीलीटर अतिरिक्त दूध दिया गया था
- जुलाई 2023: ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी
- नवंबर 2022: ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी
अब प्रस्तावित ₹8 की पूरी वृद्धि लागू होने पर नंदिनी के ब्लू पैकेट टोंड दूध की कीमत ₹46 से बढ़कर करीब ₹54 प्रति लीटर हो सकती है।
डेयरी संघों ने ₹8 से ₹10 बढ़ोतरी की थी मांग
कर्नाटक के दुग्ध उत्पादक संघों ने दूध की कीमतों में ₹8 से ₹10 प्रति लीटर तक बढ़ोतरी की मांग की थी। उनका कहना है कि पशु आहार, चारा, दवाइयों और परिवहन की लागत लगातार बढ़ रही है।
इसके अलावा प्लास्टिक पैकेजिंग की कीमतों में बढ़ोतरी और सूखे के कारण चारे की उपलब्धता प्रभावित होने से डेयरी किसानों की लागत बढ़ी है।
दुग्ध संघों के प्रतिनिधियों ने सरकार से मुलाकात कर कीमतों में बढ़ोतरी की मांग रखी थी।
दूसरे राज्यों की तुलना में खरीद कीमत का मुद्दा
दुग्ध उत्पादक संगठनों के अनुसार कर्नाटक में टोंड दूध की खरीद कीमत करीब ₹35 प्रति लीटर है। उनकी तुलना के मुताबिक आंध्र प्रदेश में यह करीब ₹41.50, केरल में ₹41.80, महाराष्ट्र में ₹41 और तमिलनाडु में ₹42.24 प्रति लीटर बताई गई है।
दुग्ध संघों का तर्क है कि कीमत बढ़ाने से किसानों को दूध का बेहतर भुगतान किया जा सकेगा और बढ़ती उत्पादन लागत का दबाव कुछ कम होगा।
किसानों की आय बढ़ाने पर जोर
सरकार और दुग्ध उत्पादक संगठनों की ओर से कीमत बढ़ाने के पीछे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का तर्क दिया जा रहा है। उनका कहना है कि अगर किसानों को उत्पादन लागत के अनुरूप भुगतान नहीं मिलेगा तो दूध उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, अंतिम कीमत और लागू होने की तारीख पर चुनाव आयोग की अनुमति तथा राज्य सरकार के अंतिम फैसले के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
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