नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल उठाए जाने के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई दी है कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था।
रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बताया कि प्रधानमंत्री का संदर्भ उन लोगों से था, जो माओवादी विचारधारा और अलगाववादी गतिविधियों का समर्थन करते हैं।
रिजिजू ने बताईं ‘दिमागी नक्सल’ की 3 पहचान
किरेन रिजिजू के मुताबिक, प्रधानमंत्री के इस्तेमाल किए गए शब्द का संदर्भ ऐसे लोगों से है जो—
पहली पहचान: माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं करते।
दूसरी पहचान: अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को वापस लाने या उसके समर्थन की बात करते हैं।
तीसरी पहचान: भारत के पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के लिए ‘चिकन नेक’ क्षेत्र को काटने जैसी साजिशों का समर्थन करते हैं।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ‘दिमागी नक्सल’ कोई औपचारिक कानूनी या संवैधानिक श्रेणी नहीं है। यह राजनीतिक विमर्श में इस्तेमाल किया गया शब्द है।
PM मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर क्या कहा?
15 अगस्त को लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुरक्षा बलों के बलिदान को याद किया और देश में नक्सली हिंसा के खिलाफ मिली सफलता का उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलवाद को बड़े स्तर पर कमजोर किया गया है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि माओवादी विचारधारा से प्रभावित लोग अब भी समाज में मौजूद हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री के इसी बयान में ‘दिमागी नक्सल’ का संदर्भ सामने आया, जिसके बाद विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच राजनीतिक बहस शुरू हो गई।
चिदंबरम का पलटवार
प्रधानमंत्री के बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि अगर प्रधानमंत्री के मानदंडों के मुताबिक यही पहचान है, तो उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहलाने पर गर्व है।
चिदंबरम की टिप्पणी के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानबाजी और तेज हो गई।
BJP की सफाई क्यों आई?
भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री का निशाना किसी राजनीतिक दल या विपक्षी नेता पर नहीं था, बल्कि उन विचारधाराओं और गतिविधियों पर था जिन्हें सरकार देश की एकता और संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरा मानती है।
किरेन रिजिजू की सफाई का उद्देश्य भी इसी बात को स्पष्ट करना था कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को सीधे विपक्ष के सभी नेताओं के लिए इस्तेमाल किया जाना प्रधानमंत्री के बयान की सही व्याख्या नहीं है।
असली विवाद क्या है?
इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
भाजपा का कहना है कि प्रधानमंत्री ने माओवादी विचारधारा, अलगाववाद और भारत विरोधी गतिविधियों के समर्थकों को लेकर चेतावनी दी।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार राजनीतिक विरोध को बदनाम करने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रही है।
यानी विवाद सिर्फ एक शब्द का नहीं, बल्कि इस बात का है कि माओवादी विचारधारा और लोकतांत्रिक राजनीतिक असहमति के बीच सीमा कहां खींची जाए।
Action Bharat Fact Note
‘दिमागी नक्सल’ कोई आधिकारिक कानूनी वर्गीकरण नहीं है। इसे प्रधानमंत्री के राजनीतिक भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द के रूप में समझना चाहिए। किरेन रिजिजू ने बाद में इसके संदर्भ को स्पष्ट करते हुए माओवादी समर्थकों, अलगाववाद के समर्थकों और भारत की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ गतिविधियों से जुड़े लोगों की बात की।
