1971 भूल गए क्या?’ पाक सांसद ने मुनीर को सुनाई खरी-खरी

विदेश

पेशावर। पाकिस्तान में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच बढ़ती तनातनी के बीच वरिष्ठ पाकिस्तानी नेता और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर तीखा हमला बोला है। पेशावर में एक सभा को संबोधित करते हुए फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व को 1971 के युद्ध और ढाका में हुए आत्मसमर्पण की याद दिलाते हुए सेना के ताकत संबंधी दावों पर सवाल उठाए।

फजलुर रहमान ने कहा कि पाकिस्तान की जनता पहले भी सेना के बड़े-बड़े दावे सुन चुकी है। उन्होंने दिसंबर 1971 का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि उस समय भी पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व ने आखिरी दम तक लड़ने की बातें की थीं, लेकिन अंततः पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा और पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा अलग होकर बांग्लादेश बन गया।

🎯 1971 का जिक्र कर सेना पर सीधा हमला

फजलुर रहमान ने अपने भाषण में तत्कालीन सैन्य शासक जनरल याह्या खान के बयानों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि 1971 में भी पाकिस्तानी जनता को यह बताया गया था कि सेना सड़क, खेत, रेगिस्तान और पहाड़ों तक लड़ाई जारी रखेगी।

लेकिन इतिहास में दर्ज घटनाक्रम इसके बिल्कुल विपरीत रहा। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद बांग्लादेश का गठन हुआ। फजलुर रहमान ने इसी इतिहास को मौजूदा सैन्य नेतृत्व के सामने रखते हुए उसके ताकत के दावों पर सवाल उठाया।

🎯 ‘जनता मुश्किल में है तो ताकत किस बात की?’

JUI-F प्रमुख ने पाकिस्तान की आम जनता की परेशानियों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि जब देश की जनता गंभीर समस्याओं से गुजर रही है तो सत्ता और सैन्य प्रतिष्ठान लगातार तनाव और संघर्ष की स्थिति क्यों पैदा कर रहे हैं।

उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के हालात का जिक्र करते हुए पाकिस्तान में जारी हिंसा और अस्थिरता पर चिंता जताई। साथ ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया।

🎯 ‘खून बहता रहा तो नक्शा बदल सकता है’

फजलुर रहमान ने अपने भाषण में एक बेहद गंभीर चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि अगर किसी क्षेत्र में लंबे समय तक दमन और खून-खराबा जारी रहता है तो उसके परिणाम बड़े भौगोलिक बदलाव के रूप में सामने आ सकते हैं।

उनका यह बयान पाकिस्तान के अंदर मौजूद अलगाववादी आंदोलनों और क्षेत्रीय असंतोष के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि यह फजलुर रहमान की राजनीतिक चेतावनी है, किसी संभावित सीमा परिवर्तन की स्वतंत्र पुष्टि या भविष्यवाणी नहीं।

🎯 संसद और सेना के बीच शक्ति संतुलन पर भी सवाल

फजलुर रहमान ने केवल सैन्य नीतियों पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि पाकिस्तान में सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसद की भूमिका को मजबूत रखने की बात कही।

उनका कहना था कि सेना प्रमुख या सैन्य नेतृत्व के पास बड़ी जिम्मेदारियां होना अलग बात है, लेकिन संसद और संघीय सरकार की शक्तियां किसी एक व्यक्ति या संस्था के हाथों में केंद्रित नहीं होनी चाहिए।

🎯 पाकिस्तान में बढ़ रही सेना विरोधी राजनीतिक आवाज

फजलुर रहमान का यह हमला ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक भूमिका, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की स्थिति तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज है।

1971 का संदर्भ देकर सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर निशाना साधना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पाकिस्तान में सैन्य प्रतिष्ठान लंबे समय से देश की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है।

Action Bharat News की नजर: फजलुर रहमान के बयान का सबसे अहम हिस्सा यह है कि पाकिस्तान के भीतर से ही सैन्य नेतृत्व को उसके इतिहास की याद दिलाकर सार्वजनिक रूप से सवालों के घेरे में खड़ा किया जा रहा है। हालांकि उनके बयानों को राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देखना जरूरी है और इससे भविष्य के किसी संभावित भौगोलिक बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

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