वंदे मातरम् पर सियासी संग्राम: कांग्रेस का फैसला, BJP के हमले से बढ़ा विवाद

राजनीति

नई दिल्ली। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो पदों के गायन का फैसला किया है। इसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण की राजनीति को लेकर निशाना साधना शुरू कर दिया है।

🎯 कांग्रेस ने सिर्फ पहले दो पदों पर क्यों जोर दिया?

कांग्रेस का कहना है कि यह कोई नया फैसला नहीं है। पार्टी 1937 में लिए गए अपने ऐतिहासिक रुख का हवाला दे रही है।

कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के अनुसार, 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने गीत के पहले दो पदों को स्वीकार किया था। पार्टी का तर्क है कि उस समय उद्देश्य सभी समुदायों को साथ लेकर चलना था।

कांग्रेस इसी ऐतिहासिक फैसले को आधार बनाकर अपने वर्तमान रुख को उचित बता रही है।

🎯 बीजेपी ने क्यों किया हमला?

कांग्रेस के फैसले के बाद बीजेपी ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत कई नेताओं ने कांग्रेस पर हमला बोला है।

जेपी नड्डा ने 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि वंदे मातरम् को दो हिस्सों में बांटने का फैसला देश की राजनीति में विभाजनकारी सोच को बढ़ावा देने वाला था।

वहीं गिरिराज सिंह और दिनेश शर्मा ने भी कांग्रेस पर तीखे राजनीतिक हमले किए और उसके पुराने रुख को मुस्लिम लीग तथा जिन्ना की राजनीति से जोड़ने की कोशिश की।

🎯 150वीं वर्षगांठ के बीच विवाद

वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ को लेकर देशभर में कार्यक्रम चल रहे हैं। इसी दौरान कांग्रेस का केवल पहले दो पदों पर जोर देना बीजेपी के लिए कांग्रेस को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर घेरने का बड़ा अवसर बन गया है।

खबर के अनुसार, सरकार ने हाल में वंदे मातरम् को जन गण मन के बराबर दर्जा देने के लिए राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम संबंधी कानून में संशोधन किया है। ऐसे समय में दोनों प्रमुख दलों के बीच इस मुद्दे पर टकराव और महत्वपूर्ण हो गया है।

🎯 क्या कांग्रेस BJP के राजनीतिक जाल में फंस गई?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।

बीजेपी लंबे समय से कांग्रेस को राष्ट्रवाद और कथित तुष्टिकरण के मुद्दे पर घेरती रही है। ऐसे में कांग्रेस के मौजूदा फैसले से बीजेपी को एक बार फिर यही नैरेटिव आगे बढ़ाने का मौका मिल गया है।

लेकिन कांग्रेस का नजरिया अलग है। पार्टी इसे 1937 की ऐतिहासिक परंपरा और धर्मनिरपेक्ष राजनीति से जोड़कर देख रही है।

कांग्रेस के लिए यह कदम अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग के मतदाताओं को संदेश देने की कोशिश भी माना जा रहा है। दूसरी तरफ बीजेपी इसे राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।

🎯 अब असली राजनीतिक सवाल

क्या कांग्रेस वास्तव में बीजेपी के बनाए राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण के नैरेटिव में फंस गई है?

या फिर कांग्रेस ने जानबूझकर 1937 के अपने ऐतिहासिक रुख को सामने रखकर अपने पारंपरिक वोट आधार को मजबूत करने का राजनीतिक दांव चला है?

वंदे मातरम् का विवाद अब केवल गीत के कितने पद गाए जाएं, इतना भर नहीं रह गया है—यह आने वाली राजनीति में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और वोट बैंक की लड़ाई का बड़ा मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *