नई दिल्ली। भारत में बीमा का इतिहास काफी पुराना है। आधुनिक रूप में भारत में जीवन बीमा कारोबार की शुरुआत 19वीं सदी में हुई, लेकिन समय के साथ देश में कई भारतीय और विदेशी बीमा कंपनियां अस्तित्व में आईं। स्वतंत्रता के बाद जीवन बीमा को आम लोगों, खासकर ग्रामीण आबादी तक पहुंचाने और इस क्षेत्र को व्यवस्थित करने की जरूरत महसूस हुई। इसी प्रक्रिया का नतीजा आगे चलकर भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC के रूप में सामने आया।
1 सितंबर 1956 भारत के बीमा इतिहास में एक महत्वपूर्ण तारीख बन गई। इसी दिन जीवन बीमा कारोबार के राष्ट्रीयकरण के बाद Life Insurance Corporation of India (LIC) अस्तित्व में आई। इसके गठन के पीछे मुख्य उद्देश्य देश में जीवन बीमा का विस्तार करना और ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक सुरक्षा के दायरे में लाना था।
भारत में आधुनिक बीमा की शुरुआत कब हुई?
भारत में आधुनिक जीवन बीमा की शुरुआत 1818 में कोलकाता से मानी जाती है। उस समय यूरोपीय समुदाय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ओरिएंटल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की शुरुआत हुई थी।
शुरुआती दौर में बीमा कंपनियां मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों को सेवाएं देती थीं। भारतीयों के लिए बीमा की पहुंच सीमित थी और उन्हें कई मामलों में अधिक प्रीमियम का सामना करना पड़ता था।
बाद में भारतीयों के लिए भी जीवन बीमा की सुविधा उपलब्ध होने लगी और देश में कई भारतीय बीमा कंपनियों की स्थापना हुई।
1870 में शुरू हुई पहली भारतीय जीवन बीमा कंपनी
1870 में बॉम्बे म्यूचुअल लाइफ एश्योरेंस सोसाइटी की शुरुआत हुई। इसे भारतीयों के लिए सामान्य दरों पर जीवन बीमा उपलब्ध कराने वाली शुरुआती महत्वपूर्ण कंपनियों में गिना जाता है।
इसके बाद देश में बीमा कारोबार तेजी से बढ़ा। 1896 में भारत इंश्योरेंस कंपनी और उसके बाद कई अन्य भारतीय बीमा कंपनियां स्थापित हुईं।
1907 में कोलकाता स्थित रवींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर जोरासांको के एक कमरे में हिंदुस्तान को-ऑपरेटिव इंश्योरेंस कंपनी की शुरुआत भी बीमा इतिहास की चर्चित घटनाओं में शामिल रही।
1912 में आया पहला बड़ा कानूनी बदलाव
1912 तक भारत में जीवन बीमा कारोबार को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक कानून नहीं था। इसके बाद Life Insurance Companies Act, 1912 और Provident Fund Act लागू किए गए।
Life Insurance Companies Act के तहत बीमा कंपनियों की प्रीमियम दरों और समय-समय पर किए जाने वाले मूल्यांकन को बीमा गणितज्ञ से प्रमाणित कराने जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं।
हालांकि, उस समय भारतीय और विदेशी बीमा कंपनियों के बीच असमानता को लेकर भी सवाल उठते रहे।
1938 में सरकार का नियंत्रण बढ़ा
बीमा कारोबार के विस्तार के साथ इस क्षेत्र को नियंत्रित करने की आवश्यकता भी बढ़ती गई। 1938 का Insurance Act इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस कानून ने जीवन बीमा के साथ गैर-जीवन बीमा कारोबार को भी नियामकीय दायरे में लाया।
इसी दौर में कमजोर और असफल बीमा कंपनियों की संख्या को लेकर भी चिंताएं सामने आईं। इसके बाद जीवन बीमा कारोबार के राष्ट्रीयकरण की मांग जोर पकड़ने लगी।
1956 में हुआ जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण
स्वतंत्रता के बाद जीवन बीमा को व्यापक स्तर पर आम जनता तक पहुंचाने की नीति पर जोर बढ़ा। आखिरकार 1956 में जीवन बीमा कारोबार के राष्ट्रीयकरण का फैसला हुआ।
संसद ने 19 जून 1956 को Life Insurance Corporation Act पारित किया। इसके बाद 1 सितंबर 1956 को LIC की स्थापना हुई।
उस समय देश में काम कर रही विभिन्न भारतीय और विदेशी बीमा कंपनियों तथा प्रोविडेंट फंड से जुड़ी संस्थाओं को एक बड़े सार्वजनिक जीवन बीमा संगठन के तहत लाया गया।
245 कंपनियों और संस्थाओं के विलय से बनी LIC
LIC के गठन के समय 245 बीमा कंपनियों और प्रोविडेंट सोसायटियों/संस्थाओं को मिलाकर एक बड़ा संगठन बनाया गया। इसका उद्देश्य जीवन बीमा कारोबार को एकीकृत करना और देश के ज्यादा से ज्यादा नागरिकों तक बीमा सुविधा पहुंचाना था।
उस समय बीमा कारोबार आज की तरह डिजिटल नहीं था। न ऑनलाइन पॉलिसी खरीदने की सुविधा थी, न मोबाइल ऐप और न ही कुछ सेकंड में प्रीमियम भुगतान की व्यवस्था।
जब बैलगाड़ी से गांव-गांव पहुंचते थे LIC एजेंट
LIC के शुरुआती दौर की सबसे दिलचस्प तस्वीर ग्रामीण भारत से जुड़ी है।
आज जहां बीमा एजेंट मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल दस्तावेजों के जरिए काम करते हैं, वहीं शुरुआती दशकों में एजेंटों को देश के दूर-दराज के गांवों तक पहुंचने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती थी।
कई इलाकों में बैलगाड़ी, साइकिल या पैदल जाकर एजेंट लोगों से संपर्क करते थे। उनका काम सिर्फ पॉलिसी बेचना नहीं था, बल्कि ग्रामीण आबादी को जीवन बीमा और आर्थिक सुरक्षा की जरूरत के बारे में समझाना भी था।
दूर-दराज के क्षेत्रों में घर-घर पहुंचकर लोगों को बीमा के बारे में जानकारी देने की यह व्यवस्था LIC के विस्तार में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
LIC बनाने के पीछे क्या था मकसद?
LIC के गठन का सबसे बड़ा उद्देश्य जीवन बीमा को देश के व्यापक वर्ग तक पहुंचाना था। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में उस समय बीमा की पहुंच काफी सीमित थी।
सरकार चाहती थी कि जीवन बीमा केवल बड़े शहरों और आर्थिक रूप से मजबूत लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि आम नागरिक भी अपने परिवार के भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित कर सकें।
इसी सोच के साथ LIC ने धीरे-धीरे देशभर में अपना नेटवर्क बनाया और बीमा को आम लोगों तक पहुंचाने का काम किया।
70 साल बाद भी क्यों महत्वपूर्ण है LIC का इतिहास?
1 सितंबर 1956 से लेकर आज तक LIC भारतीय वित्तीय और बीमा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। इसके गठन की कहानी सिर्फ एक सरकारी कंपनी के बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर को भी दिखाती है जब भारत में बीमा को आम जनता तक पहुंचाने के लिए पारंपरिक तरीकों से बड़े पैमाने पर प्रयास किए जा रहे थे।
बैलगाड़ी से गांवों तक पहुंचने वाले एजेंटों से लेकर आज के डिजिटल बीमा प्लेटफॉर्म तक का सफर भारतीय बीमा क्षेत्र में आए बड़े बदलाव को दिखाता है।
यानी 1 सितंबर 1956 को शुरू हुई LIC की कहानी उस दौर से शुरू होती है, जब बीमा एजेंटों को ग्राहक तक पहुंचने के लिए बैलगाड़ी और साइकिल का सहारा लेना पड़ता था, और आज वही बीमा कारोबार डिजिटल तकनीक के दौर में पहुंच चुका है।
