नई दिल्ली: देश में कैब ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर, फूड डिलीवरी एजेंट और दूसरे प्लेटफॉर्म आधारित कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की दिशा में सरकार की ओर से नियमों पर चर्चा जारी है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा कोष से जोड़ना है, जिन्हें पारंपरिक नौकरी की तरह नियमित कर्मचारी के रूप में नहीं माना जाता।
इस व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्लेटफॉर्म कंपनियों से सामाजिक सुरक्षा के लिए अंशदान किस आधार पर लिया जाए। इसके लिए मुख्य रूप से दो विकल्पों पर चर्चा है—कंपनी के वार्षिक कारोबार के आधार पर अंशदान या कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के आधार पर अंशदान।
इसका सीधा असर कैब, ऑटो, बाइक-टैक्सी और डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों और उनसे जुड़े लाखों कामगारों पर पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला?
भारत में ऐप आधारित सेवाओं का कारोबार तेजी से बढ़ा है। Ola और Uber जैसी राइड-हेलिंग कंपनियों के अलावा ऑनलाइन फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म बड़ी संख्या में लोगों को काम उपलब्ध कराते हैं।
इन कामगारों को आमतौर पर गिग वर्कर या प्लेटफॉर्म वर्कर कहा जाता है। इनमें कैब ड्राइवर, बाइक राइडर, डिलीवरी पार्टनर और दूसरे स्वतंत्र सेवा प्रदाता शामिल हो सकते हैं।
इन कामगारों की आय अक्सर उनके द्वारा किए गए ट्रिप, ऑर्डर या दूसरे काम की संख्या से जुड़ी होती है। इसलिए इनके लिए पारंपरिक कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन या दूसरी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं को लागू करना अलग तरह की चुनौती पैदा करता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए सामाजिक सुरक्षा के लिए अलग व्यवस्था पर काम किया जा रहा है।
सामाजिक सुरक्षा कोष से क्या फायदा होगा?
प्रस्तावित व्यवस्था का मूल उद्देश्य गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है।
ऐसे कोष के जरिए पात्र कामगारों को सरकार द्वारा निर्धारित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल सकता है। इससे बीमारी, दुर्घटना, जीवन और भविष्य से जुड़े आर्थिक जोखिमों से निपटने में मदद मिलने की संभावना है।
हालांकि, किस योजना के तहत कितना लाभ मिलेगा और किस कामगार को किस आधार पर पात्र माना जाएगा, इसका वास्तविक स्वरूप अंतिम नियमों और उनके कार्यान्वयन पर निर्भर करेगा।
किस आधार पर कंपनियों से लिया जाएगा पैसा?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अंशदान की गणना है।
एक विकल्प में कंपनी के वार्षिक कारोबार यानी टर्नओवर को आधार बनाया जा सकता है। दूसरे विकल्प में प्लेटफॉर्म द्वारा अपने गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान का एक निश्चित प्रतिशत अंशदान के रूप में लिया जा सकता है।
यही अंतर अलग-अलग प्लेटफॉर्म कारोबारों के लिए लागत में बड़ा बदलाव कर सकता है।
पहला विकल्प: वार्षिक कारोबार के आधार पर
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत एग्रीगेटर कंपनियों के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान का प्रावधान किया गया है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, एग्रीगेटर को अपने वार्षिक कारोबार का 1 से 2 प्रतिशत तक अंशदान देना होगा। हालांकि, यह अंशदान संबंधित एग्रीगेटर द्वारा गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
इस मॉडल में कंपनी के कुल कारोबार को मुख्य आधार बनाया जाता है।
दूसरा विकल्प: कामगारों को किए गए भुगतान का प्रतिशत
दूसरे मॉडल में सीधे यह देखा जा सकता है कि प्लेटफॉर्म कंपनी अपने कामगारों को कुल कितना भुगतान करती है।
मंत्रालय के स्तर पर कामगारों को किए गए भुगतान के 5 प्रतिशत तक के आधार पर अंशदान की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है।
यह व्यवस्था खासतौर पर उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हो सकती है जहां बहुत बड़ी संख्या में छोटे-छोटे लेनदेन होते हैं।
Ola और Uber जैसी कंपनियों पर क्या असर पड़ सकता है?
राइड-हेलिंग कारोबार में प्रतिदिन बड़ी संख्या में यात्राएं होती हैं। हर ट्रिप की कीमत अपेक्षाकृत कम हो सकती है, लेकिन ट्रिप की संख्या बहुत अधिक होती है।
ऐसे कारोबार में यदि कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर अंशदान लिया जाता है, तो कंपनियों की कुल लागत काफी बढ़ सकती है।
उद्योग जगत से जुड़े विश्लेषकों का तर्क है कि भुगतान आधारित मॉडल राइड-हेलिंग कंपनियों पर कारोबार आधारित मॉडल की तुलना में अलग और संभावित रूप से अधिक वित्तीय दबाव डाल सकता है।
हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव अंशदान की अंतिम दर, गणना की पद्धति और सरकार द्वारा तय नियमों पर निर्भर करेगा।
डिलीवरी कंपनियों पर भी पड़ेगा असर
यह बहस केवल कैब कंपनियों तक सीमित नहीं है।
फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जुड़े डिलीवरी पार्टनर भी गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की श्रेणी में आते हैं।
इन कारोबारों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में ऑर्डर पूरे किए जाते हैं। ऐसे में यदि अंशदान प्रत्येक कामगार को किए गए भुगतान से जोड़ा जाता है, तो बड़ी संख्या में लेनदेन करने वाले प्लेटफॉर्म पर इसका वित्तीय असर अलग हो सकता है।
यही कारण है कि उद्योग जगत चाहता है कि अंशदान का फॉर्मूला इस तरह बनाया जाए जिससे अलग-अलग प्लेटफॉर्म कारोबारों के बीच असमान वित्तीय बोझ न पैदा हो।
कामगारों को कब मिल सकता है लाभ?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के तहत पात्रता के लिए कामगार के प्लेटफॉर्म से जुड़े रहने की न्यूनतम अवधि का भी प्रावधान है।
किसी एक एग्रीगेटर के साथ वित्त वर्ष में 90 दिन या कई एग्रीगेटर कंपनियों के साथ कुल 120 दिन काम करने के बाद गिग वर्कर इस योजना के तहत लाभ के लिए पात्र हो सकता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का लाभ वास्तव में प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था से जुड़े कामगारों तक पहुंचे।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सरकार के सामने चुनौती केवल सामाजिक सुरक्षा कोष बनाने की नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष और व्यावहारिक फंडिंग व्यवस्था तय करने की भी है।
एक तरफ कामगारों को सामाजिक सुरक्षा देना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ ऐसा मॉडल भी जरूरी है जिससे प्लेटफॉर्म कंपनियों पर अचानक अत्यधिक वित्तीय दबाव न पड़े।
विशेष रूप से कम मूल्य लेकिन अधिक संख्या वाले लेनदेन वाले कारोबारों के लिए अंशदान का फॉर्मूला महत्वपूर्ण होगा।
कारोबार आधारित मॉडल बनाम भुगतान आधारित मॉडल
दोनों विकल्पों को सरल तरीके से समझें:
| आधार | कारोबार आधारित मॉडल | भुगतान आधारित मॉडल |
|---|---|---|
| गणना का आधार | कंपनी का वार्षिक कारोबार | कामगारों को किया गया भुगतान |
| प्रस्तावित दर | 1-2% तक | भुगतान का 5% तक |
| मुख्य प्रभाव | कंपनी के कुल कारोबार से जुड़ा | सीधे वर्कर भुगतान से जुड़ा |
| संभावित चुनौती | अलग-अलग कारोबार मॉडल में असर अलग | अधिक ट्रांजैक्शन वाले क्षेत्रों पर अधिक बोझ |
| कामगारों पर उद्देश्य | सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान | सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान |
क्या यह नया नियम लागू हो चुका है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। अंशदान की गणना के तरीके को लेकर चर्चा का मतलब यह नहीं है कि नया फॉर्मूला अंतिम रूप से लागू हो चुका है।
सरकार और संबंधित पक्षों के बीच इस व्यवस्था के व्यावहारिक पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। अंतिम नियम, दर और गणना की पद्धति आधिकारिक अधिसूचना तथा संबंधित नियमों के जरिए स्पष्ट होगी।
इसलिए फिलहाल इसे प्रस्तावित/विचाराधीन व्यवस्था के रूप में देखना उचित है।
गिग वर्कर्स के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत में रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐप आधारित प्लेटफॉर्म लोगों को काम करने का लचीला विकल्प देते हैं, लेकिन इस मॉडल में पारंपरिक नौकरी की तरह सामाजिक सुरक्षा का ढांचा हमेशा उपलब्ध नहीं होता।
यदि सामाजिक सुरक्षा कोष प्रभावी तरीके से लागू होता है, तो इससे गिग वर्कर्स को भविष्य के आर्थिक जोखिमों से निपटने में सहायता मिल सकती है।
दूसरी तरफ कंपनियों के लिए अंशदान की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर उनके बिजनेस मॉडल, कमीशन संरचना और सेवाओं की कीमत पर भी पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
Ola-Uber से लेकर ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म तक, भारत की गिग अर्थव्यवस्था में लाखों लोग काम कर रहे हैं। ऐसे में उनके लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा तैयार करना एक महत्वपूर्ण नीतिगत कदम हो सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कंपनियों से सामाजिक सुरक्षा अंशदान कारोबार के आधार पर लिया जाएगा या कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर।
सरकार जिस मॉडल को अंतिम रूप देगी, उसका असर एक तरफ कंपनियों की लागत पर और दूसरी तरफ गिग वर्कर्स को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पर पड़ेगा। इसलिए अंतिम नियमों का स्वरूप प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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