असम (Action Bharat) | दिल्ली में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों के बीच राजधानी की स्थिति में कुछ सुधार जरूर दर्ज हुआ है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में दिल्ली 48 बड़े शहरों में 21वें स्थान पर पहुंच गई है, जबकि वर्ष 2025 में राजधानी 32वें स्थान पर थी। हालांकि रैंकिंग में सुधार के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण के लिए उपलब्ध धनराशि के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत दिल्ली के लिए करोड़ों रुपये उपलब्ध कराए गए, लेकिन जारी राशि का एक छोटा हिस्सा ही अब तक खर्च हो पाया है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए योजनाएं और बजट होने के बावजूद जमीन पर उनका प्रभाव अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं दिखाई दे रहा।
48 शहरों में दिल्ली 21वें स्थान पर
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में 10 लाख से अधिक आबादी वाले 48 शहरों को शामिल किया गया। दिल्ली को 172 अंक मिले और वह 21वें स्थान पर रही।
इस सूची में लखनऊ 198 अंकों के साथ पहले और इंदौर 197 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहा। वर्ष 2025 में दिल्ली 157.3 अंक के साथ 32वें स्थान पर थी।
हालांकि रैंकिंग में सुधार को सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञों और प्रदूषण के आंकड़ों के लिहाज से यह सुधार दिल्ली की वायु गुणवत्ता की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
NCAP फंड का सिर्फ 17 प्रतिशत इस्तेमाल
प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्र के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत वर्ष 2020-21 से 2025-26 के बीच दिल्ली के लिए करीब 113 करोड़ रुपये मंजूर किए गए।
इनमें से लगभग 99.77 करोड़ रुपये आवंटित हुए और 23 दिसंबर 2025 तक करीब 81.36 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके थे। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इसमें से केवल 14 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए।
यानी जारी राशि का करीब 17 प्रतिशत ही इस्तेमाल हो सका।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि NCAP का उद्देश्य केवल सड़क पर पानी का छिड़काव कर धूल को दबाना नहीं है। इसके तहत वाहनों, उद्योगों, निर्माण एवं सड़क की धूल, कचरा और बायोमास जलाने जैसे प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण के साथ-साथ वायु गुणवत्ता की निगरानी को मजबूत करने की योजना है।
2024-25 में खर्च और भी कम
फंड के इस्तेमाल की रफ्तार को लेकर स्थिति और चिंताजनक नजर आती है। वर्ष 2024-25 में उपलब्ध राशि के मुकाबले खर्च सिर्फ करीब 2 प्रतिशत रहा।
वहीं वर्ष 2025-26 में संबंधित अवधि तक कोई खर्च दर्ज नहीं हुआ था।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण को लेकर हर साल बड़े स्तर पर योजनाएं बनाई जाती हैं, तो उनके लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल समय पर क्यों नहीं हो पा रहा है।
13 हॉटस्पॉट पर बढ़ाई गई निगरानी
दिल्ली में प्रदूषण के लिहाज से चिन्हित 13 हॉटस्पॉट पर विशेष निगरानी और नियंत्रण उपायों को बढ़ाया गया है। इनमें ओखला, द्वारका, अशोक विहार, बवाना, नरेला, मुंडका, पंजाबी बाग, वजीरपुर, रोहिणी, विवेक विहार, आनंद विहार-मंडोली, आरके पुरम और जहांगीरपुरी शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में सड़क की धूल को नियंत्रित करने के लिए पानी के छिड़काव और मिस्ट स्प्रे सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है।
इसके अलावा ऊंची इमारतों पर एंटी-स्मॉग गन लगाने की व्यवस्था भी की गई है। दिल्ली सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 156 एंटी-स्मॉग गन लगाई जा चुकी हैं।
पुराने उपायों के साथ तकनीक पर भी जोर
दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए मैकेनिकल रोड स्वीपिंग, पानी का छिड़काव, कूड़ा और निर्माण मलबा हटाने, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण तथा प्रदूषणकारी उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई जैसे उपाय जारी हैं।
खुले में कचरा जलाने पर रोक और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए BS-6 वाहनों, इलेक्ट्रिक वाहनों तथा पुराने वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की नीति पर भी जोर दिया जा रहा है।
अब प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था में डेटा और तकनीक की भूमिका बढ़ाई जा रही है।
दिल्ली में 46 एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन
राजधानी में छह नए वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र जुड़ने के बाद निगरानी नेटवर्क बढ़कर 46 स्टेशनों तक पहुंच गया है।
हालांकि विशेषज्ञों ने निगरानी केंद्रों के भौगोलिक वितरण पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बाहरी दिल्ली के मुकाबले मध्य और दक्षिणी दिल्ली में निगरानी का नेटवर्क अधिक केंद्रित है। ऐसे में पूरे शहर की वास्तविक प्रदूषण स्थिति को समझने के लिए निगरानी नेटवर्क का संतुलित विस्तार जरूरी माना जा रहा है।
PM2.5 और PM10 में सुधार, लेकिन चुनौती बरकरार
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में दिल्ली का वार्षिक PM2.5 और PM10 स्तर 2018 से 2025 के बीच 2020 को छोड़कर सबसे कम रहा।
यह सुधार निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन दिल्ली की हवा को सुरक्षित स्तर तक लाने के लिए इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली में प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान केवल उस समय दिखाई देने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने से नहीं होगा। इसके लिए प्रदूषण के मूल स्रोतों पर पूरे साल लगातार कार्रवाई करनी होगी।
‘इवेंट’ आधारित कार्रवाई के बजाय सालभर की रणनीति जरूरी
विशेषज्ञों की चिंता यह है कि कई बार प्रदूषण बढ़ने के बाद तत्काल नियंत्रण वाले उपायों पर अधिक जोर दिया जाता है। इसके बजाय प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कर लंबे समय तक चलने वाली रणनीति तैयार करने की जरूरत है।
इसके लिए प्रत्येक हॉटस्पॉट के लिए अलग स्रोत आधारित प्रदूषण नियंत्रण योजना, NCAP फंड की नियमित सार्वजनिक समीक्षा और खर्च की जिम्मेदारी तय करने जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सड़क की धूल के लिए केवल पानी का छिड़काव करने के बजाय सड़कों की मरम्मत और नियमित सफाई का स्थायी मॉडल विकसित करना, निर्माण मलबे और कचरा जलाने पर रियल-टाइम निगरानी तथा वाहनों और उद्योगों के लिए अलग-अलग प्रदूषण नियंत्रण लक्ष्य तय करना भी जरूरी होगा।
वार्ड स्तर तक निगरानी की जरूरत
प्रदूषण नियंत्रण की प्रभावी व्यवस्था के लिए वार्ड स्तर तक AQI और PM2.5 आधारित प्रदर्शन की निगरानी करने का सुझाव भी महत्वपूर्ण है।
दिल्ली के साथ NCR के शहरों में भी प्रदूषण के स्रोत एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए केवल दिल्ली तक सीमित कार्रवाई के बजाय दिल्ली-NCR के लिए एकीकृत कार्ययोजना तैयार करना प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में अधिक प्रभावी कदम साबित हो सकता है।
दिल्ली की स्वच्छ वायु सर्वेक्षण रैंकिंग
| वर्ष | दिल्ली की रैंक | स्कोर |
|---|---|---|
| 2026 | 21वीं | 172 |
| 2025 | 32वीं | 157.3 |
| 2024 | 11वीं | 181 |
| 2023 | 9वीं | 177 |
बड़ा सवाल
दिल्ली की रैंकिंग में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन NCAP के तहत जारी 81.36 करोड़ रुपये में से सिर्फ 14 करोड़ रुपये खर्च होना यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए उपलब्ध संसाधनों का पूरा और समयबद्ध इस्तेमाल क्यों नहीं हो पा रहा है। राजधानी को बेहतर रैंकिंग के साथ-साथ हवा की वास्तविक गुणवत्ता में भी स्थायी सुधार की जरूरत है।
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