नई दिल्ली (Action Bharat) | केंद्र सरकार अस्पतालों में दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और उपचार में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर मिल रही शिकायतों की समीक्षा कर रही है। खासतौर पर उन मामलों पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां अस्पताल किसी दवा या मेडिकल सामान को निर्माता अथवा बाजार से अपेक्षाकृत कम कीमत पर खरीदते हैं, लेकिन मरीज के बिल में उसकी कीमत कई गुना अधिक दर्ज की जाती है।
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, समीक्षा में अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई राशि के बीच के अंतर को प्रमुख आधार बनाया जा रहा है। समीक्षा के निष्कर्ष सामने आने के बाद सरकार मरीजों से होने वाली अत्यधिक वसूली को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदमों पर फैसला कर सकती है।
खरीद कीमत और मरीज के बिल के बीच अंतर पर फोकस
सरकार की समीक्षा में यह देखा जा रहा है कि अस्पताल किसी दवा, चिकित्सा उपकरण या कंज्यूमेबल को निर्माता या बाजार से कितनी कीमत में खरीदता है और उसी सामान के लिए मरीज से कितनी राशि वसूलता है। केवल उत्पाद की अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी को ही आधार नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि वास्तविक खरीद कीमत और बिलिंग राशि के बीच के अंतर का भी आकलन किया जा रहा है।
मंत्रालय इसी अंतर के आधार पर अस्पतालों की खरीद और बिलिंग व्यवस्था को समझने की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि मरीजों से वसूली जाने वाली राशि और अस्पताल की वास्तविक खरीद लागत के बीच कितना अंतर है।
महाराष्ट्र की जांच में सामने आए कीमतों के बड़े अंतर
स्रोत के अनुसार महाराष्ट्र में अस्पतालों की खरीद और मरीजों की बिलिंग से जुड़े दस्तावेजों की जांच के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें खरीद कीमत और मरीज के बिल में दर्ज कीमत के बीच काफी अंतर पाया गया।
एक मामले में अस्पताल ने एक आईवी सेट करीब 11 रुपये में खरीदा, जबकि मरीज के बिल में इसकी कीमत 325 रुपये तक दर्ज मिली। इसी तरह करीब 29 रुपये में खरीदे गए कैथेटर की कीमत मरीज के बिल में 310 रुपये तक दर्ज मिली।
इसके अलावा करीब 7 रुपये में खरीदी गई सिरिंज की कीमत बिल में 57 रुपये तक दर्ज मिली। कुछ मामलों में 40 से 45 रुपये में खरीदे गए नेबुलाइजर और ऑक्सीजन मास्क की कीमत मरीज के बिल में 650 से 715 रुपये तक दर्ज की गई।
मरीजों के लिए कीमत की तुलना करना आसान नहीं
अस्पताल में इलाज के दौरान आईवी सेट, सिरिंज, कैथेटर, ऑक्सीजन मास्क और दूसरे कंज्यूमेबल्स की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन अस्पताल में भर्ती मरीज या उसके परिजनों के लिए इन सामानों की बाजार कीमत से तुलना करना या बाहर से इन्हें खरीदना कई परिस्थितियों में आसान नहीं होता।
ऐसी स्थिति में यदि अस्पताल की खरीद कीमत और मरीज के बिल में दर्ज राशि के बीच बड़ा अंतर हो, तो उपचार का कुल खर्च बढ़ सकता है। दवाओं के मामले में अस्पताल की इन-हाउस फार्मेसी से खरीद की व्यवस्था होने पर मरीज की निर्भरता और बढ़ सकती है।
देशभर में अस्पतालों की खरीद और बिलिंग व्यवस्था की पड़ताल
महाराष्ट्र में सामने आए मामलों के बाद अब अस्पतालों में दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और कंज्यूमेबल्स की खरीद तथा मरीजों से वसूली जाने वाली राशि के बीच अंतर को लेकर मंत्रालय स्तर पर समीक्षा की जा रही है।
स्रोत के अनुसार, अस्पतालों से जुड़े पक्षों के साथ इस मुद्दे पर बातचीत भी की जा रही है। इसके साथ ही ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने के विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
अस्पताल संचालकों की लागत का भी होगा ध्यान
अस्पताल संचालकों की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि अस्पताल की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच के पूरे अंतर को सीधे मुनाफा नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार अस्पतालों को सामान के भंडारण, स्टाफ, संक्रमण नियंत्रण, आपूर्ति व्यवस्था और अन्य परिचालन खर्च भी उठाने पड़ते हैं।
मंत्रालय की समीक्षा में इन परिचालन लागतों को भी ध्यान में रखा जा रहा है। यानी सरकार की समीक्षा केवल खरीद कीमत और मरीज के बिल के बीच अंतर देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि अस्पतालों की वास्तविक लागत संरचना को भी समझने का प्रयास किया जा रहा है।
समीक्षा के बाद तय होंगे अगले कदम
केंद्र सरकार की समीक्षा पूरी होने के बाद उसके निष्कर्षों के आधार पर मरीजों से होने वाली अत्यधिक वसूली को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक व्यवस्था और कदम तय किए जा सकते हैं। फिलहाल समीक्षा का प्रमुख फोकस अस्पतालों की वास्तविक खरीद कीमत, मरीजों के बिल और अस्पतालों की परिचालन लागत के बीच संबंध को समझना है।
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