धर्म डेस्क, नई दिल्ली (Action Bharat) | जीवित्पुत्रिका व्रत को कई क्षेत्रों में जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत संतान की दीर्घायु, सुख और मंगलकामना के लिए रखा जाता है। इस व्रत से जुड़ी प्रमुख परंपराओं में जितिया धागा धारण करना भी शामिल है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के बाद धारण किया जाने वाला यह धागा संतान के लिए सुरक्षा और मंगलकामना के प्रतीक के रूप में माना जाता है।
भगवान जीमूतवाहन की पूजा के बाद धारण करने की परंपरा
व्रत रखने वाली माताएं भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान लाल या पीले रंग के धागे को अर्पित करने और पूजा के बाद उसे कलाई या गले में धारण करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
इसे बच्चों की सलामती और दीर्घायु की कामना के साथ किए गए संकल्प का प्रतीक माना जाता है। यह धागा मां के अपने बच्चों के प्रति प्रेम और उनकी मंगलकामना से भी जोड़ा जाता है।
जितिया धागे में लगाई जाती हैं गांठें
प्रचलित मान्यता के अनुसार धागे में परिवार की संतानों की संख्या के आधार पर गांठें लगाई जाती हैं। कुछ परंपराओं में संतानों की संख्या से एक अधिक गांठ लगाने की बात कही जाती है।
धागे का रंग और इसे बांधने की विधि क्षेत्र तथा परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
कितने समय तक धारण करें?
कुछ मान्यताओं में व्रत के बाद धागे को कम से कम 24 घंटे धारण करने की बात कही जाती है। कई महिलाएं इसे अधिक समय तक भी धारण करती हैं।
धागा उतारने के तरीके को लेकर भी अलग-अलग पारिवारिक परंपराएं हैं। इसलिए इसे उतारते समय अपने परिवार की मान्यता या पुरोहित द्वारा बताई गई विधि का पालन करना उचित माना जाता है।
धार्मिक कथा से जुड़ा है महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा भगवान जीमूतवाहन से जुड़ी कथा से संबंधित मानी जाती है। इसी धार्मिक परंपरा के कारण इस व्रत में उनकी पूजा और जितिया धागा धारण करने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।
नोट: जितिया धागे के रंग, गांठों की संख्या, धारण करने की अवधि और उतारने की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती है।
Action Bharat | धर्म और परंपरा से जुड़ी विशेष खबर
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