नई दिल्ली (Action Bharat) | दिल्ली में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति का पूर्वानुमान लगाने वाली व्यवस्था कई मामलों में प्रभावी है, लेकिन पुराने उत्सर्जन आंकड़ों और पड़ोसी जिलों से आने वाले प्रदूषण की अधूरी जानकारी के कारण इसकी सटीकता प्रभावित हो रही है।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के अध्ययन ‘How Well Can Delhi Predict Air Quality?’ में यह बात सामने आई है। दिल्ली का एयर क्वालिटी अर्ली वार्निंग सिस्टम (AQEWS) तीन दिन का वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान देता है, जबकि डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (DSS) PM2.5 में अलग-अलग स्रोतों के योगदान का आकलन करता है।
DSS दिल्ली में प्रदूषण पहुंचाने वाले 19 पड़ोसी जिलों से आने वाले PM2.5 के कुल योगदान की जानकारी देता है। इनमें गाजियाबाद, गुरुग्राम, अलवर और करनाल जैसे जिले शामिल हैं। लेकिन समस्या यह है कि इन जिलों से आने वाले प्रदूषण का उद्योग, परिवहन या अन्य स्रोतों के आधार पर विस्तृत ब्योरा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट करना मुश्किल हो जाता है कि दिल्ली की हवा खराब करने में किस जिले का कौन सा क्षेत्र कितना योगदान दे रहा है।
2016-18 के आंकड़ों पर निर्भरता
अध्ययन के अनुसार, दिल्ली के लिए सिस्टम में 2018 के उत्सर्जन आंकड़े, जबकि NCR के जिलों के लिए 2016 के उत्सर्जन इन्वेंट्री का इस्तेमाल किया जा रहा है। NCR से बाहर के क्षेत्रों के लिए वैश्विक उत्सर्जन डेटाबेस पर निर्भरता है।
CEEW ने पुराने उत्सर्जन आंकड़ों को मौजूदा पूर्वानुमान प्रणाली की प्रमुख सीमाओं में शामिल करते हुए इन्हें नियमित रूप से अपडेट करने की सिफारिश की है।
पूर्वानुमान की सटीकता पर मौसम भी बड़ा असर डालता है। हवा की गति और दिशा, तापमान, वातावरण की ऊपरी परत की ऊंचाई और पराली जलाने जैसी मौसमी घटनाओं के उत्सर्जन का सही अनुमान लगाना चुनौती बना हुआ है।
तीसरे दिन घटती है सटीकता
IITM के अध्ययन के हवाले से बताया गया है कि प्रदूषण का पूर्वानुमान पहले और दूसरे दिन अपेक्षाकृत बेहतर रहता है, जबकि तीसरे दिन इसकी सटीकता मध्यम हो जाती है।
हालांकि 2023-24 और 2024-25 की सर्दियों में ‘बहुत खराब’ या उससे खराब वायु गुणवत्ता की घटनाओं का 80 प्रतिशत से अधिक मामलों में सफल पूर्वानुमान लगाया गया।
फिर भी अनुमान और वास्तविक प्रदूषण स्तर में बड़ा अंतर दिखाई देता है। 2024-25 की सर्दियों में मॉडल ने दिल्ली में औसत PM2.5 करीब 149 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहने का अनुमान लगाया था, जबकि वास्तविक औसत लगभग 175 माइक्रोग्राम रहा। इसी तरह PM10 का अनुमान करीब 231 माइक्रोग्राम था, जबकि वास्तविक स्तर लगभग 292 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ।
CEEW ने सुझाव दिया है कि DSS में पड़ोसी जिलों के क्षेत्रवार प्रदूषण योगदान, अलग-अलग प्रदूषण नियंत्रण उपायों के प्रभाव और मशीन लर्निंग आधारित पूर्वानुमान सुधार को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही प्रदूषण पूर्वानुमान प्रणाली को केवल सर्दियों तक सीमित रखने के बजाय पूरे साल संचालित करने की जरूरत बताई गई है।
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