नई दिल्ली। विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले FCRA संशोधन विधेयक 2026 को लेकर देश में बहस तेज हो गई है। सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत करना है, जबकि विपक्ष को आशंका है कि नए प्रावधानों से सरकार को नागरिक संस्थाओं पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है।
विधेयक लोकसभा में पेश किए जाने के बाद चर्चा के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया है।
क्या बदलने का प्रस्ताव है?
प्रस्तावित संशोधनों में एक नामित प्राधिकरण बनाने का प्रावधान है। किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द, समाप्त या सरेंडर होने की स्थिति में विदेशी धन और उससे बनाई गई संपत्तियों का नियंत्रण इस प्राधिकरण के पास जा सकता है।
अगर संपत्ति किसी पूजा या धार्मिक स्थल की है, तो उसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। वहीं, नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम जेल की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव बताया गया है।
सरकार बनाम विपक्ष
सरकार का तर्क है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देशविरोधी या अवैध गतिविधियों में नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, विपक्ष और कुछ नागरिक समूहों का कहना है कि नए प्रावधानों का इस्तेमाल NGO, धर्मार्थ और अल्पसंख्यक संस्थानों पर अतिरिक्त दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल
विधेयक में संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़े कई व्यावहारिक सवाल भी उठ रहे हैं—मसलन, अगर किसी संस्थान की संपत्ति विदेशी फंड और स्थानीय चंदे दोनों से बनी हो तो उसका फैसला कैसे होगा? शिक्षण संस्थानों या स्वास्थ्य केंद्रों के सरकारी नियंत्रण में आने पर वहां के कर्मचारियों और लाभार्थियों का क्या होगा?
यही वजह है कि FCRA संशोधन को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता और नागरिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर बहस तेज हो गई है।
ACTION BHARAT | NATIONAL DESK
विदेशी चंदे पर सख्ती या संस्थाओं पर नियंत्रण? FCRA संशोधन विधेयक 2026 अब JPC के पास, सरकार और विपक्ष आमने-सामने।
