नई दिल्ली: चीन से जुड़ी विदेशी कंपनियों के भारत में निवेश को लेकर सरकार की नई नीति का असर अब दिखाई देने लगा है। 10 प्रतिशत तक चीनी हिस्सेदारी वाली विदेशी कंपनियों को कुछ शर्तों के साथ भारत में निवेश की अनुमति देने के बाद अब तक 29 FDI प्रस्तावों के जरिए करीब ₹4,895.65 करोड़ के निवेश की जानकारी सामने आई है।
सरकार ने मई 2026 में ऐसे विदेशी निवेशकों के लिए नियमों में बदलाव किया था। इसका उद्देश्य उन कंपनियों के निवेश को आसान बनाना है जिनमें चीन या हांगकांग की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक है।
29 FDI प्रस्तावों से आया करीब ₹4,900 करोड़
मामले की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी के मुताबिक, नए नियमों के बाद अब तक 29 FDI प्रस्तावों के जरिए ₹4,895.65 करोड़ का निवेश आया है।
इन निवेश प्रस्तावों से भारत के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पूंजी पहुंची है। इनमें आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सूचना एवं संचार, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, डेटा सेंटर और ट्रांसपोर्ट सर्विसेज जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
यानी चीन से जुड़ी कंपनियों के निवेश को लेकर नियमों में बदलाव का असर केवल एक सेक्टर तक सीमित नहीं रहा है।
किन देशों के रास्ते आया निवेश?
इन 29 FDI प्रस्तावों में निवेशक संस्थाएं सीधे चीन से नहीं, बल्कि मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे देशों या क्षेत्रों में मौजूद संस्थाओं के माध्यम से जुड़ी थीं।
सरकार के बदले हुए नियमों के तहत अगर किसी विदेशी कंपनी में चीन या हांगकांग की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक है, तो वह उन क्षेत्रों में निवेश कर सकती है जहां FDI के लिए ऑटोमैटिक रूट की अनुमति है।
इससे निवेशकों को हर मामले में पहले से सरकारी मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती, हालांकि संबंधित रिपोर्टिंग और क्षेत्रीय नियमों का पालन करना जरूरी है।
आखिर क्यों बदला गया नियम?
पहले चीन से जुड़ी कंपनियों के निवेश को लेकर भारत में ज्यादा सख्त मंजूरी व्यवस्था थी। इसका मकसद संवेदनशील क्षेत्रों और महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियों में संभावित सुरक्षा जोखिमों को नियंत्रित करना था।
लेकिन नए नियमों में सीमित हिस्सेदारी वाले विदेशी निवेशकों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। इससे सरकार को उम्मीद है कि भारत में विदेशी पूंजी, तकनीक और उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है।
खासकर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, AI और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बड़ी पूंजी की जरूरत को देखते हुए यह बदलाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चीन से जुड़ी कंपनियों को पूरी छूट नहीं
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि चीन की कंपनियों को भारत में निवेश के लिए पूरी तरह खुली छूट मिल गई है।
नए आसान नियम चीन, हांगकांग या भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों में पंजीकृत संस्थाओं पर लागू नहीं होते।
भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं।
यानी नियमों में बदलाव मुख्य रूप से उन विदेशी कंपनियों के लिए है जिनकी चीन या हांगकांग से सीमित हिस्सेदारी जुड़ी है और जो किसी तीसरे देश में पंजीकृत हैं।
निवेश बढ़ने से क्या होगा फायदा?
सरकार के इस कदम से भारत में विदेशी निवेश बढ़ने के साथ-साथ कई उद्योगों को पूंजी और तकनीकी सहयोग मिलने की उम्मीद है।
खासकर AI, सेमीकंडक्टर से जुड़े इकोसिस्टम, डेटा सेंटर, फार्मा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश से उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है और रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा वैश्विक कंपनियां भारत को चीन के विकल्प के रूप में अपनी सप्लाई चेन का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे समय में निवेश प्रक्रिया को आसान बनाना भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन सुरक्षा को लेकर चुनौती बरकरार
चीन से जुड़ी कंपनियों के निवेश को आसान बनाने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील तकनीक की सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा।
सरकार ने इसी वजह से 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी सीमा और अन्य पात्रता शर्तें रखी हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में लागू अलग-अलग नियमों का पालन भी जरूरी रहेगा।
Bottom Line
चीन से जुड़ी कंपनियों के निवेश नियमों में ढील का शुरुआती परिणाम सामने आ गया है। 29 FDI प्रस्तावों के जरिए करीब ₹4,895.65 करोड़ का निवेश भारत में आया है।
यह निवेश आईटी, AI, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, डेटा सेंटर और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्रों में पहुंचा है। अब देखना होगा कि आने वाले महीनों में यह नीति भारत में विदेशी निवेश और उत्पादन क्षमता को कितनी तेजी से बढ़ाती है।
स्रोत: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से संबंधित जानकारी / सरकारी FDI नीति / PTI
