नई दिल्ली (एक्शन भारत)। नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद राहत और बचाव के साथ अब शवों की पहचान बड़ी चुनौती बन गई है। पोखरा में रखे बॉडी नंबर 1003 पर दो अलग-अलग परिवारों ने अपने लापता रिश्तेदार होने का दावा किया है। दोनों परिवारों के दावों में समानता होने के कारण अधिकारियों ने अब DNA टेस्ट को पहचान का आधार बनाया है।
बाढ़ और भूस्खलन के बाद नेपाल में 900 से अधिक लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। बड़ी संख्या में शव मिलने के कारण उनकी सही पहचान करना प्रशासन के लिए मुश्किल हो रहा है।
🎯 बॉडी नंबर 1003 पर दो दावे
पोखरा एकेडमी ऑफ हेल्थ साइंसेज में रखे शव नंबर 1003 को लेकर पहला दावा मैलुंग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के कर्मचारी गोपाल डाहित के परिवार ने किया। डाहित बाढ़ के बाद लापता थे। उनके परिजनों ने शव की तस्वीर और शारीरिक बनावट को देखकर उसे डाहित का शव बताया।
इसी बीच रूपनदेही के टूरिस्ट गाइड दामोदर बस्याल के परिवार ने भी इसी शव को अपना रिश्तेदार बताया। दामोदर भी बाढ़ के बाद लापता थे। उनके भाई राधेश्याम शर्मा बस्याल ने शव की तस्वीर में कुछ खास निशानों और चेहरे की बनावट को अपने भाई से मिलता-जुलता बताया।
दोनों परिवार अपने दावे पर कायम रहे। इसके बाद प्रशासन ने शव को किसी एक परिवार को सौंपने के बजाय DNA जांच कराने का फैसला किया।
🎯 पांच परिवारों से लिए गए DNA सैंपल
कास्की जिला पुलिस के मुताबिक, यह अकेला मामला नहीं है। अस्पताल में एक अन्य शव पर भी दो परिवारों ने दावा किया है। अब तक पांच परिवारों के रिश्तेदारों के DNA सैंपल लिए जा चुके हैं, ताकि शवों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान की जा सके।
अधिकारियों का कहना है कि आपदा के दौरान शवों की स्थिति बदल जाने और बड़ी संख्या में शव मिलने के कारण केवल शारीरिक पहचान के आधार पर शव सौंपना जोखिम भरा हो सकता है। DNA मिलान से गलत व्यक्ति को शव सौंपे जाने की आशंका को खत्म किया जा सकेगा।
🎯 102 शव पोखरा लाए गए
रिपोर्ट के अनुसार, गोरखा, तनाहुन, धाडिंग और पूर्वी नवलपरासी से कुल 102 शव पोखरा लाए गए थे। रविवार तक इनमें से 16 शवों की पहचान कर उन्हें उनके परिजनों को सौंपा जा चुका था।
लेकिन बॉडी नंबर 1003 का मामला इस पूरी पहचान प्रक्रिया की मुश्किलों को सामने लाता है। एक ही शव को दो परिवार अपने-अपने लापता रिश्तेदार का बता रहे हैं। अब DNA रिपोर्ट ही यह तय करेगी कि आखिर शव किसका है।
यह मामला बताता है कि इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा के बाद राहत और बचाव के साथ मृतकों की वैज्ञानिक पहचान भी प्रशासन के सामने एक बेहद गंभीर चुनौती बन गई है।
