नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण की समस्या को नियंत्रित करने के लिए पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी को और प्रभावी बनाने की तैयारी की जा रही है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) अब केवल यह गिनने तक सीमित नहीं रहना चाहता कि खेतों में कितनी जगह आग लगी, बल्कि यह भी पता लगाने की दिशा में काम कर रहा है कि कितने क्षेत्रफल में पराली जली और लगभग कितनी मात्रा में फसल अवशेष प्रभावित हुआ।
CAQM की प्रस्तावित व्यवस्था में ‘बर्न्ट एरिया’ यानी जले हुए क्षेत्रफल को निगरानी का महत्वपूर्ण आधार बनाया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे पराली जलाने की वास्तविक स्थिति का ज्यादा सटीक आकलन करने के साथ-साथ उन इलाकों की पहचान करने में भी मदद मिलेगी, जहां बड़े स्तर पर फसल अवशेष जलाए जा रहे हैं।
केवल घटनाओं की संख्या से पूरी तस्वीर नहीं मिलती
हर साल पंजाब, हरियाणा और आसपास के राज्यों में धान की कटाई के बाद खेतों में बचे फसल अवशेष को जलाने की घटनाएं सामने आती हैं। इन घटनाओं का असर दिल्ली-एनसीआर की हवा पर भी पड़ता है, खासकर अक्टूबर और नवंबर के दौरान जब हवा की गति कम होने और मौसम की अन्य परिस्थितियों के कारण प्रदूषक वातावरण में जमा होने लगते हैं।
अब तक पराली जलाने की स्थिति का आकलन मुख्य रूप से सैटेलाइट से मिलने वाले फायर काउंट यानी आग की घटनाओं की संख्या के आधार पर किया जाता रहा है। लेकिन एक ही घटना के तहत छोटा या बड़ा क्षेत्र जल सकता है। ऐसे में केवल घटनाओं की संख्या को आधार बनाने से पराली जलाने की वास्तविक मात्रा और उसके संभावित प्रभाव की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
इसी वजह से CAQM निगरानी व्यवस्था में जले हुए क्षेत्रफल को भी शामिल करने पर काम कर रहा है।
‘बर्न्ट एरिया’ से पता चलेगा कितनी जमीन प्रभावित हुई
CAQM के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, आयोग ऐसी स्पष्ट व्यवस्था तैयार कर रहा है जिसके जरिए खेतों में पराली जलने के बाद जले हुए क्षेत्रफल का आकलन किया जा सके।
इसका उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं होगा कि किसी क्षेत्र में आग लगी या नहीं, बल्कि यह समझना भी होगा कि:
- कितने क्षेत्र में पराली जलाई गई।
- आग से कितना खेत प्रभावित हुआ।
- अलग-अलग क्षेत्रों में आग की तीव्रता कितनी थी।
- किन इलाकों में बड़े पैमाने पर फसल अवशेष जलाए गए।
- पराली जलाने की वास्तविक स्थिति पिछले वर्षों की तुलना में कितनी बदली है।
इससे प्रशासन के पास केवल घटनाओं की संख्या के बजाय जमीन पर हुए वास्तविक प्रभाव का एक अतिरिक्त आंकड़ा उपलब्ध होगा।
आंकड़ों में अंतर के बाद निगरानी व्यवस्था पर जोर
पराली जलाने की घटनाओं में कमी को लेकर अलग-अलग अध्ययनों और सरकारी आंकड़ों में अंतर सामने आता रहा है। दिसंबर 2025 में तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया था कि वर्ष 2021 की तुलना में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में क्रमशः 93 प्रतिशत और 91 प्रतिशत की कमी आई है।
हालांकि, आई फॉरेस्ट के एक अध्ययन में कमी की दर इससे कम बताई गई थी। अलग-अलग आकलनों के कारण पराली जलाने की समस्या की वास्तविक स्थिति को लेकर आंकड़ों की तुलना और निगरानी की पद्धति महत्वपूर्ण हो गई है।
यही वजह है कि अब केवल ‘कितनी बार आग लगी’ के बजाय ‘कितने क्षेत्र में आग लगी’ जैसे मानकों पर भी ध्यान देने की तैयारी है।
पंजाब में जला क्षेत्रफल घटा, लेकिन समस्या अभी भी बड़ी
उपलब्ध अध्ययन के अनुसार, पंजाब में पराली से प्रभावित जला हुआ क्षेत्र वर्ष 2022 में लगभग 31,447 वर्ग किलोमीटर बताया गया था, जो वर्ष 2025 में घटकर करीब 20,000 वर्ग किलोमीटर रह गया।
इसी तरह हरियाणा में वर्ष 2019 में जला क्षेत्र लगभग 11,633 वर्ग किलोमीटर था, जो वर्ष 2025 में घटकर करीब 8,812 वर्ग किलोमीटर बताया गया।
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि समय के साथ पराली जलाने के क्षेत्र में कमी आई है, लेकिन प्रभावित क्षेत्र अभी भी इतना बड़ा है कि दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता के संदर्भ में इसकी निगरानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आग की तीव्रता से जिम्मेदारी तय करने में मिलेगी मदद
CAQM के अधिकारियों का मानना है कि जले क्षेत्रफल के साथ आग की तीव्रता का आकलन भी उपयोगी साबित हो सकता है।
यदि किसी क्षेत्र में छोटी आग की कई घटनाएं सामने आती हैं और दूसरे क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम लेकिन बड़े क्षेत्रफल में पराली जलती है, तो केवल फायर काउंट के आधार पर दोनों की तुलना वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शा सकती।
बर्न्ट एरिया और आग की तीव्रता से यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी विशेष स्थान पर कितनी मात्रा में फसल अवशेष जला और वहां समस्या कितनी गंभीर थी।
इसके आधार पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया को भी मजबूत किया जा सकता है।
दिल्ली-NCR के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण के कई स्थानीय और क्षेत्रीय कारण होते हैं। इनमें वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक उत्सर्जन, सड़क की धूल और मौसम संबंधी परिस्थितियां शामिल हैं। इनके साथ पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से उत्पन्न धुआं भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय चिंता बना रहता है।
ऐसे में पराली जलाने के आंकड़ों की सटीकता महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि निगरानी व्यवस्था ज्यादा सटीक होगी तो प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति भी बेहतर तरीके से तैयार की जा सकेगी।
CAQM का नया तरीका इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
किसानों के लिए विकल्प और निगरानी—दोनों पर जोर जरूरी
पराली जलाने की समस्या को केवल कार्रवाई और निगरानी के जरिए खत्म करना आसान नहीं है। इसके लिए किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के व्यावहारिक और आर्थिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
फसल अवशेष को मशीनों के जरिए खेत में मिलाने, उसका उपयोग जैव ईंधन या अन्य उत्पादों में करने और स्थानीय स्तर पर उसके आर्थिक उपयोग को बढ़ावा देने जैसे उपायों पर भी लगातार जोर दिया जाता रहा है।
ऐसे में CAQM की नई निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि यह पहचानना भी हो सकता है कि समस्या किन क्षेत्रों में अधिक गंभीर है और वहां प्रशासनिक हस्तक्षेप तथा वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत कहां सबसे ज्यादा है।
निष्कर्ष
दिल्ली-NCR में सर्दियों के प्रदूषण से निपटने के लिए पराली जलाने की निगरानी अब केवल आग की घटनाओं की गिनती तक सीमित नहीं रहने वाली है। CAQM जले हुए क्षेत्रफल और आग की तीव्रता जैसे मानकों को निगरानी व्यवस्था में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अगर यह व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू होती है, तो इससे पराली जलाने की वास्तविक स्थिति का अधिक विस्तृत आंकड़ा सामने आ सकता है और बड़े पैमाने पर फसल अवशेष जलाने वाले क्षेत्रों की पहचान करना आसान हो सकता है। इसका सीधा उद्देश्य दिल्ली-एनसीआर की सर्दियों वाली प्रदूषण समस्या से निपटने के लिए ज्यादा सटीक निगरानी और बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
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