BRICS के दौरान चमक उठा कनॉट प्लेस, व्यापारियों का सवाल—आम दिनों में क्यों नहीं दिखता यही नजारा?

दिल्ली

नई दिल्ली (Action Bharat) | राजधानी दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस (CP) का बदला हुआ स्वरूप BRICS सम्मेलन के दौरान चर्चा का विषय बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को देखते हुए सुरक्षा और व्यवस्था के कड़े इंतजामों के बीच कनॉट प्लेस को अतिक्रमण मुक्त कराया गया, जिसके बाद इसके बरामदे और गलियारे लंबे समय बाद पूरी तरह खुले और साफ नजर आए।

इस बदले हुए नजारे को देखकर स्थानीय व्यापारियों और दिल्लीवासियों ने सवाल उठाया है कि जब विदेशी प्रतिनिधियों के आने पर कुछ दिनों में कनॉट प्लेस को व्यवस्थित और अतिक्रमण मुक्त किया जा सकता है, तो आम दिनों में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं रहती।

अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बदला कनॉट प्लेस का स्वरूप

BRICS और इससे पहले G-20 जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के तहत कनॉट प्लेस से अवैध रेहड़ी-पटरी और अन्य अतिक्रमण हटाए गए। इसके बाद सीपी के बरामदे, गलियारे और पैदल चलने के रास्ते काफी खुले नजर आए।

व्यापारियों ने पूछा—365 दिन ऐसा क्यों नहीं?

स्थानीय व्यापारियों और आम नागरिकों का कहना है कि विदेशी प्रतिनिधियों और मेहमानों के आगमन पर यदि तीन-चार दिनों के लिए बाजार को अतिक्रमण से मुक्त कराया जा सकता है, तो दिल्ली की आम जनता को साल के बाकी दिनों में भी साफ और खुले रास्तों का अधिकार मिलना चाहिए।

व्यापारियों का सवाल सीधे तौर पर व्यवस्था की निरंतरता को लेकर है—क्या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के समय ही होगी या इसे नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाएगा?

दिल्ली पुलिस और NDMC की कार्यशैली पर सवाल

कनॉट प्लेस के बदले स्वरूप को लेकर स्थानीय व्यापारियों और दिल्लीवासियों ने सोशल मीडिया पर नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) और दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बड़े आयोजनों के दौरान जिस तरह प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय दिखाई देती है, वैसी ही सक्रियता आम दिनों में भी दिखाई देनी चाहिए।

अवैध रेहड़ी-पटरी का विवाद दशकों पुराना

कनॉट प्लेस में अवैध रेहड़ी-पटरी और वेंडिंग को लेकर विवाद नया नहीं है। न्यू दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन (NDTA) लंबे समय से इस मुद्दे को उठाता रहा है और इसे लेकर आंदोलन तथा कानूनी लड़ाई भी चलती रही है।

कोर्ट के आदेशों के बावजूद उठता रहा है अतिक्रमण का मुद्दा

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न आदेशों में कनॉट प्लेस को ‘नो-हॉकिंग’ और ‘नो-वेंडिंग जोन’ के तौर पर घोषित किए जाने की बात स्पष्ट की है। इसका उद्देश्य क्षेत्र के ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व की रक्षा करना है। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर ढिलाई के आरोपों के बीच बरामदों में अवैध दुकानें और वेंडिंग की समस्या सामने आती रही है।

व्यापारियों के सामने कारोबार का संकट

स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि अवैध वेंडरों के कारण नियमित दुकानदारों के कारोबार पर असर पड़ता है। इसके अलावा भीड़भाड़ बढ़ने से पैदल चलने वाले ग्राहकों को भी परेशानी होती है। संकरे और भीड़भाड़ वाले रास्तों के कारण सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी पैदा हो सकती हैं।

बड़े आयोजनों में लौट आता है CP का ‘असली वैभव’

रिपोर्ट में व्यापारियों और स्थानीय लोगों की ओर से यह बात सामने आई है कि G-20 और BRICS जैसे बड़े आयोजनों के दौरान दिल्ली पुलिस और NDMC की सक्रियता से कनॉट प्लेस का पुराना स्वरूप काफी हद तक वापस दिखाई देता है। खुले बरामदों में खरीदार बिना बाधा के घूमते नजर आते हैं।

अब स्थायी समाधान की मांग

स्थानीय दिल्लीवासियों और व्यापारी संगठनों की मांग है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान दिखाई देने वाली इस ‘अस्थायी सफाई’ को स्थायी व्यवस्था में बदला जाए। उनका कहना है कि कनॉट प्लेस को नियमित रूप से अतिक्रमण मुक्त रखा जाए और अदालतों के आदेशों का प्रभावी ढंग से पालन कराया जाए।

कनॉट प्लेस का BRICS के दौरान बदला स्वरूप अब एक बड़ा सवाल छोड़ रहा है—जब राजधानी के सबसे प्रमुख बाजार को कुछ दिनों में व्यवस्थित और अतिक्रमण मुक्त किया जा सकता है, तो आम नागरिकों को सालभर ऐसा ही साफ, सुरक्षित और सुगम कनॉट प्लेस क्यों नहीं मिल सकता?

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