नई दिल्ली (Action Bharat) | दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अब शरीर के अंदर मौजूद बेहद बारीक रक्त और लसीका नसों की सर्जरी के लिए सुपर माइक्रोसर्जरी तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो गया है। इस तकनीक के जरिए 0.3 से 0.5 मिलीमीटर तक की बेहद छोटी रक्त और लसीका वाहिकाओं पर सर्जरी संभव होगी। एम्स के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न्स सर्जरी विभाग ने इस तकनीक की शुरुआत की है और अब तक छह मरीजों पर इसका इस्तेमाल किया जा चुका है।
सुपर माइक्रोसर्जरी को माइक्रोसर्जरी का अधिक उन्नत स्वरूप बताया गया है। इसमें ऐसी नसों पर काम किया जाता है जिनका आकार सामान्य माइक्रोसर्जरी में इस्तेमाल होने वाली रक्त वाहिकाओं से भी काफी छोटा होता है। इस तकनीक के लिए अत्याधुनिक माइक्रोस्कोप और बेहद महीन सर्जिकल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।
बाल से भी कई गुना पतले टांकों का इस्तेमाल
सुपर माइक्रोसर्जरी में जिन नसों को जोड़ा जाता है, उनका आकार कई बार सिर्फ 0.3 से 0.5 मिलीमीटर होता है। इतनी छोटी वाहिकाओं पर काम करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले टांके भी बेहद महीन होते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाले टांके बाल की एक लट से तीन से पांच गुना तक पतले होते हैं। ऐसी सर्जरी के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए सूक्ष्म उपकरणों और अत्यधिक क्षमता वाले सर्जिकल माइक्रोस्कोप की जरूरत होती है।
फाइलेरिया और लिम्फेडिमा के मरीजों को भी मिलेगा लाभ
AIIMS में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान सुपर माइक्रोसर्जरी के जरिए छह सर्जरी की गईं। इनमें फाइलेरिया से प्रभावित मरीज की लसीका नसों पर सुपर माइक्रोसर्जरी भी शामिल थी।
इसके अलावा स्तन कैंसर के उपचार के बाद हाथ में होने वाली सूजन यानी लिम्फेडिमा के उपचार में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
इससे कैंसर उपचार के बाद लसीका तंत्र से जुड़ी समस्याओं वाले मरीजों के लिए पुनर्निर्माण उपचार के नए विकल्प उपलब्ध होने की संभावना है।
लंबे समय से न भरने वाले डायबिटिक फुट के घाव में भी इस्तेमाल
सुपर माइक्रोसर्जरी का इस्तेमाल लंबे समय से न भरने वाले डायबिटिक फुट के घाव के पुनर्निर्माण में भी किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में बेहद पतले त्वचा फ्लैप का इस्तेमाल किया गया। यह तकनीक ऐसे जटिल घावों के पुनर्निर्माण में एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है।
इतनी छोटी नसों की पहचान सबसे बड़ी चुनौती
सुपर माइक्रोसर्जरी में केवल नस को जोड़ना ही चुनौती नहीं है। सर्जन के लिए शरीर के अंदर मौजूद इतनी छोटी रक्त और लसीका वाहिकाओं की पहचान करना भी महत्वपूर्ण होता है।
इसके लिए कार्यशाला में दो उन्नत तकनीकों का प्रदर्शन किया गया—
- इंडोसाइनिन ग्रीन (ICG) आधारित इन्फ्रारेड मैपिंग
- हाई-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग
इन तकनीकों की मदद से शरीर के भीतर मौजूद बेहद छोटी वाहिकाओं की पहचान और उनकी मैपिंग करने में सहायता मिलती है।
दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ ने दिया प्रशिक्षण
AIIMS में आयोजित कार्यशाला में सुपर माइक्रोसर्जरी और लसीका पुनर्निर्माण के क्षेत्र के विशेषज्ञ दक्षिण कोरिया के प्रो. जून पियो (जेपी) होंग प्रमुख विशेषज्ञ के तौर पर शामिल हुए।
इसके अलावा गंगा अस्पताल, कोयंबटूर के डॉ. हरि वेंकटरमणि और एस्टर अस्पताल, कासरगोड की डॉ. समरीन जफर भी विशेषज्ञ के रूप में मौजूद रहीं।
AIIMS की ओर से प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. मनीष सिंघल के साथ डॉ. शशांक चौहान, डॉ. शिवांगी साहा और डॉ. नंदिनी सिंह तंवर ने भी कार्यशाला में हिस्सा लिया।
AIIMS में हर साल 300 से ज्यादा माइक्रोसर्जरी
AIIMS में वर्तमान में हर साल 300 से अधिक माइक्रोसर्जरी की जाती हैं। विभाग के अनुसार, सुपर माइक्रोसर्जरी के साथ आईसीजी मैपिंग और हाई-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग को उपचार व्यवस्था में शामिल करने से विभिन्न मरीजों के लिए पुनर्निर्माण उपचार के नए विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।
विशेष रूप से स्तन और अन्य कैंसर के उपचार के बाद होने वाली समस्याओं, लिम्फेडिमा और डायबिटिक फुट से जुड़े मामलों में इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं बताई गई हैं।
भविष्य में अन्य सर्जरी के विकल्प तलाशने की योजना
AIIMS का विभाग इस तकनीक के आधार पर भविष्य में डिमेंशिया और माइग्रेन से संबंधित सर्जरी के नए विकल्प विकसित करने की संभावनाएं भी तलाश रहा है।
इस तरह AIIMS में सुपर माइक्रोसर्जरी की शुरुआत बेहद छोटी रक्त और लसीका वाहिकाओं से जुड़े जटिल मामलों के उपचार में एक नई तकनीकी क्षमता जोड़ती है। फिलहाल इसका इस्तेमाल फाइलेरिया, लिम्फेडिमा, कैंसर उपचार के बाद की समस्याओं और डायबिटिक फुट जैसे मामलों में किया गया है।
Action Bharat | Delhi Desk
