नई दिल्ली (Action Bharat) | हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार से जुड़े कई रीति-रिवाज निभाए जाते हैं। इन्हीं में से एक है मृतक के नाक और कान में रुई लगाना। आमतौर पर यह परंपरा अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान निभाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं में इसे शरीर से जुड़े खुले मार्गों को बंद करने और आत्मा के मोह से मुक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
गरुड़ पुराण से जुड़ी धार्मिक मान्यता
गरुड़ पुराण के प्रेत खंड से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद भी आत्मा का शरीर से मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता। इसी विश्वास के आधार पर मृतक के शरीर के खुले मार्गों को रुई से बंद करने की परंपरा बताई जाती है।
कुछ धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि ऐसा करने से शरीर पर नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता। हालांकि, ये धार्मिक विश्वास हैं; इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
तुलसी और गंगाजल का भी है महत्व
अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपराओं में मृतक के मुंह में तुलसी का पत्ता रखने और गंगाजल की कुछ बूंदें अर्पित करने का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और इसे मृतक की आत्मा की शांति तथा सद्गति की कामना से जोड़ा जाता है।
अंतिम संस्कार से पहले निभाई जाने वाली परंपराएं
हिंदू रीति-रिवाजों में अंतिम यात्रा से पहले कुछ परंपराएं निभाई जाती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में इनकी विधि भिन्न हो सकती है। आम तौर पर इनमें शामिल हैं:
- मृतक के शरीर को स्नान कराना और अंतिम संस्कार की तैयारी करना।
- कुछ परंपराओं में शव के नीचे कुशा बिछाना।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार गंगाजल और तुलसी अर्पित करना।
- मृतक के पैरों के अंगूठों को धागे से बांधना।
- परिवार और परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार की विधि पूरी करना।
परंपरा का भाव: सम्मान और शांति
नाक-कान में रुई लगाने की परंपरा को धार्मिक दृष्टि से आत्मा की शांति और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। इन रीति-रिवाजों का मूल भाव मृतक के प्रति सम्मान व्यक्त करना और परिवार को अंतिम विदाई की धार्मिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया से जोड़ना है।
ध्यान रहे कि अंतिम संस्कार की विधियां स्थानीय परंपराओं और परिवार की मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
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