जंतर-मंतर पर बिना नेमप्लेट ड्यूटी करते दिखे दिल्ली पुलिस के जवान, सुरक्षा को लेकर पुलिस ने बताई वजह

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नई दिल्ली (Action Bharat) | जंतर-मंतर पर हालिया विरोध-प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस के कई जूनियर पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट के ड्यूटी करते नजर आए। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इसके पीछे पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की सुरक्षा से जुड़ी चिंता है।

अधिकारियों का कहना है कि पहले हुए एक प्रदर्शन के दौरान भीड़ नियंत्रण में शामिल कुछ पुलिसकर्मियों की पहचान सोशल मीडिया पर सामने आ गई थी। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें ऑनलाइन निशाना बनाया गया। पुलिस को आशंका है कि किसी जवान की पहचान सार्वजनिक होने से उसके परिवार के सदस्यों को भी ऑनलाइन उत्पीड़न या विवाद का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से जंतर-मंतर पर ग्राउंड लेवल पर तैनात कुछ जूनियर पुलिसकर्मियों को बिना नेमप्लेट ड्यूटी करने की अनुमति दी गई। वहीं, कई वरिष्ठ IPS अधिकारी नेमप्लेट के साथ ड्यूटी पर नजर आए।

प्रदर्शनकारियों ने उठाए जवाबदेही पर सवाल

पुलिस के इस कदम पर प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक नेताओं ने सवाल उठाए हैं। जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए CPI के राज्यसभा सांसद पी. संतोष कुमार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पुलिसकर्मियों ने अपनी पहचान छिपाई और पुलिस द्वारा बल प्रयोग तथा हिरासत की घटनाओं की जांच की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी हवाला

मामले में डीके बसु केस में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और दिल्ली पुलिस के Standing Order No. 51 का हवाला दिया गया है। सवाल यह है कि गिरफ्तारी, हिरासत या बल प्रयोग जैसी कार्रवाई के दौरान पुलिसकर्मियों की पहचान किस तरह स्पष्ट और जवाबदेह रखी जाए।

वहीं पुलिस का तर्क है कि कुछ जवान विशेष डिटेक्शन या इंटेलिजेंस यूनिट से जुड़े होते हैं और उनकी ड्यूटी की प्रकृति के कारण पहचान सार्वजनिक करना उचित नहीं होता।

सुरक्षा और जवाबदेही के बीच सवाल

जंतर-मंतर पर SIR के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान सामने आया यह मामला अब सुरक्षा बनाम पुलिस जवाबदेही की बहस बन गया है।

एक तरफ पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को सोशल मीडिया पर संभावित निशाने से बचाने की चिंता है, तो दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों का सवाल है कि पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जिम्मेदारी कैसे सुनिश्चित होगी।

यानी सवाल सिर्फ नेमप्लेट का नहीं, बल्कि पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन का है।

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