नई दिल्ली (Action Bharat) | रामायण में माता सीता के लंका प्रवास का प्रसंग बेहद भावुक और महत्वपूर्ण माना जाता है। रावण द्वारा हरण के बाद माता सीता को अशोक वाटिका में रखा गया था, जहां राक्षसियां उन्हें लगातार डराती-धमकाती थीं और रावण की बात मानने के लिए दबाव डालती थीं।
इन्हीं राक्षसियों में त्रिजटा ऐसी थीं, जिन्होंने माता सीता के प्रति करुणा और सम्मान का भाव रखा। रामायण के प्रसंगों में त्रिजटा को माता सीता की सहायता करने वाली राक्षसी के रूप में बताया गया है।
कौन थीं त्रिजटा?
वाल्मीकि रामायण में त्रिजटा का उल्लेख अशोक वाटिका में रहने वाली राक्षसी के रूप में मिलता है। बाद की रामायण परंपराओं में उन्हें विभीषण की पुत्री और सरमा की पुत्री के रूप में भी वर्णित किया गया है।
रावण ने त्रिजटा को माता सीता की पहरेदारी की जिम्मेदारी दी थी। जब अन्य राक्षसियां माता सीता को भयभीत करती थीं, तब त्रिजटा उन्हें ऐसा करने से रोकती थीं।
त्रिजटा माता सीता को श्रीराम के लंका आने और आगे होने वाली घटनाओं की जानकारी भी देती थीं। इस तरह वह लंका में रहते हुए माता सीता के लिए सहानुभूति और भरोसे का सहारा बनीं।
त्रिजटा ने सपने में क्या देखा?
रामायण के सुंदरकांड में त्रिजटा के एक महत्वपूर्ण स्वप्न का वर्णन मिलता है। उन्होंने स्वप्न में श्रीराम की विजय और रावण के विनाश के संकेत देखे।
त्रिजटा ने अन्य राक्षसियों से कहा कि उन्हें माता सीता को परेशान करना बंद कर देना चाहिए और उनसे क्षमा मांगनी चाहिए, क्योंकि आने वाले समय में श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करेंगे।
उन्होंने रावण को भी समझाने का प्रयास किया, लेकिन रावण ने उनकी बात नहीं मानी।
त्रिजटा का यह प्रसंग रामायण में यह संदेश देता है कि अधर्म के बीच रहते हुए भी किसी व्यक्ति के भीतर धर्म, करुणा और सत्य के प्रति आस्था जीवित रह सकती है।
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