नई दिल्ली (Action Bharat) | नवरात्र के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में माता रानी के भजनों और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है। मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के इलाकों में ऐसा ही एक चर्चित लोकगीत है ‘पंडा को लग गई चुड़ेलन’, जो वर्षों से स्थानीय जगरातों और देवी जागरणों का हिस्सा रहा है।
बुंदेली अंदाज में गाया जाने वाला यह लोकगीत अपनी अलग भाषा, कहानी और प्रस्तुति के कारण लोगों का ध्यान खींचता है। इसकी धुन शुरू होते ही जगराते में मौजूद लोग भक्ति के साथ लोक संस्कृति की रंगत में भी डूब जाते हैं।
क्या है ‘पंडा को लग गई चुड़ेलन’ की कहानी?
लोकगीत की शुरुआत ‘पंडा को लग गई चुड़ेलन’ जैसे शब्दों से होती है। इसमें एक ऐसे पंडा यानी गुनिया की कहानी दिखाई जाती है, जो झाड़-फूंक और तंत्र संबंधी बाधाओं को दूर करने का दावा करता है, लेकिन खुद ही कथित रूप से एक नकारात्मक शक्ति के प्रभाव में फंस जाता है।
यही विरोधाभास इस लोकगीत को रोचक बनाता है। गीत में ग्रामीण जीवन, लोकविश्वास और स्थानीय मान्यताओं को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।
नवरात्र के जगराते से खास रिश्ता
बुंदेलखंड की लोक परंपरा में गीतों और कथाओं की अपनी विशेष भूमिका रही है। ‘पंडा को लग गई चुड़ेलन’ भी इसी परंपरा का हिस्सा है। जगराते में देवी की स्तुति के साथ स्थानीय लोकभाषा और ग्रामीण जीवन से जुड़ी कहानियां लोगों को लंबे समय तक जोड़े रखती हैं।
नवरात्र के दौरान होने वाले जगराते में भक्त पूरी रात माता के भजन और कीर्तन करते हैं। इसी दौरान ऐसे लोकगीत माहौल में उत्साह और मनोरंजन का रंग भी भरते हैं।
जगराते का धार्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में नवरात्र के दौरान जागरण को देवी की भक्ति और साधना से जोड़ा जाता है। पूरी रात भजन-कीर्तन के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। सामूहिक जगराता धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता और सामूहिक भागीदारी का भी माध्यम बनता है।
लोकगीत में छिपा आध्यात्मिक संदेश
लोकमान्यताओं की व्याख्या के अनुसार, इस गीत में ‘चुड़ैल’ को मोह-माया, लालच और गलत रास्तों के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। पंडा का उसके प्रभाव में आना इस बात का रूपक माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति अगर मोह और गलत इच्छाओं में फंस जाए तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है।
इस नजरिए से देखा जाए तो यह सिर्फ मनोरंजन करने वाला लोकगीत नहीं, बल्कि लोकभाषा में जीवन के प्रति सावधान रहने का संदेश भी देता है।
बुंदेली भाषा की खास पहचान
इस लोकगीत में बुंदेलखंडी भाषा के कई स्थानीय शब्द और बोलचाल की शैली देखने को मिलती है। ‘उड़तो फिरे’, ‘गुनिया’, ‘बनो थो’ और ‘कहवे’ जैसे शब्द इसे क्षेत्र की लोकसंस्कृति से जोड़ते हैं।
यही स्थानीय रंग इस गीत को बुंदेलखंड के जगरातों में खास पहचान देता है और इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही लोक परंपरा का हिस्सा बनाए रखता है।
नोट: गीत से जुड़े आध्यात्मिक अर्थ और लोकविश्वास पारंपरिक मान्यताओं एवं लोकव्याख्याओं पर आधारित हैं।
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