बर्मिंघम/चिड़ावा। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों, संस्कारों और भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने की आवश्यकता को लेकर यूके के बर्मिंघम में आयोजित संत संसद में महत्वपूर्ण चर्चा हुई। संत संसद में जगतगुरु स्वामी चक्रपाणि महाराज ने शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा और नैतिक मूल्यों को प्रमुख स्थान देने का प्रस्ताव रखा।
जगतगुरु चक्रपाणि महाराज ने कहा कि आज की आधुनिक शिक्षा काफी हद तक नौकरी और रोजगार केंद्रित होती जा रही है। शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को रोजगार के योग्य बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके भीतर त्याग, तपस्या, अनुशासन, संस्कार और लोक-कल्याण की भावना भी विकसित करनी चाहिए।
उन्होंने देश-विदेश में अधिक से अधिक गुरुकुलों की स्थापना और बच्चों के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। संत संसद में मौजूद संत-महात्माओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया।
‘भोगवादी नहीं, योगवादी शिक्षा की जरूरत’
स्वामी चक्रपाणि महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया को आज केवल भौतिक सुख और उपभोग पर आधारित शिक्षा की नहीं, बल्कि योगवादी शिक्षा और संस्कृति की आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा का अध्ययन करना गलत नहीं है। सभी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए, लेकिन आधुनिक ज्ञान और विदेशी भाषाओं को सीखते समय अपनी जड़ों, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को नहीं भूलना चाहिए।
उनके अनुसार अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहकर ही वास्तविक और सार्वभौमिक विकास का रास्ता मजबूत किया जा सकता है।
शिक्षा में संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर
जगतगुरु चक्रपाणि महाराज ने कहा कि सनातन संस्कृति का मूल भाव पूरे विश्व के कल्याण की कामना करना है। इसलिए शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों में केवल प्रतियोगिता की भावना पैदा न करे, बल्कि मानवता, सेवा, सदाचार और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी विकसित करे।
उन्होंने गुरुकुल शिक्षा पद्धति को इस दिशा में प्रभावी माध्यम बताया। उनके मुताबिक गुरुकुलों में ज्ञान के साथ-साथ चरित्र निर्माण और संस्कारों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
संत संसद में कार्यक्रम का संचालन कर रहे संजय गिरी समेत उपस्थित संत-महात्माओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया। इस अवसर पर महामंडलेश्वर यतींद्रानंद गिरी महाराज, महामंडलेश्वर उमाकांतानंद महाराज सहित अन्य संत भी मौजूद रहे।
आने वाली पीढ़ी के लिए गुरुकुल शिक्षा की भूमिका
कार्यक्रम के समापन पर स्वामी चक्रपाणि महाराज ने कहा कि सनातन संस्कृति पर आधारित गुरुकुल शिक्षा पद्धति आने वाली पीढ़ी को चरित्रवान, संस्कारवान और लोक-कल्याणकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
उन्होंने कहा कि नैतिक मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी शिक्षा आने वाली पीढ़ी को सही दिशा देने के साथ-साथ विश्व कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है।
संदेश साफ है—शिक्षा केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित न रहे, बल्कि ज्ञान के साथ संस्कार, चरित्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी भी विकसित करे।
नोट: ऊपर की खबर आपके दिए गए पोस्टर में प्रकाशित विवरण को आधार बनाकर तैयार की गई है। उपलब्ध ऑनलाइन स्रोत भी मुख्य दावे—“भोगवादी नहीं, योगवादी शिक्षा-संस्कृति” और शिक्षा में नैतिक मूल्यों/भारतीय ज्ञान परंपरा की जरूरत—की पुष्टि करता है।
