नई दिल्ली। सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री की रिपोर्टिंग और रोकथाम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस की याचिका पर केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया।
इंस्टाग्राम पर विज्ञापनों को लेकर उठे सवाल
याचिकाकर्ता संस्था ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों के आरोप लगाए हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के निर्देशों का प्रभावी रूप से पालन नहीं कर रहे हैं। संस्था ने अदालत से इन निर्देशों को लागू कराने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग की है।
हालांकि, ये आरोप फिलहाल याचिकाकर्ता के दावे हैं और अदालत ने अभी इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
2024 के आदेश का भी दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के उस आदेश का हवाला दिया है, जिसमें ऑनलाइन मध्यस्थों यानी इंटरमीडियरीज के लिए बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े मामलों में कानून के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों पर जोर दिया गया था।
याचिका में कहा गया है कि ऐसे मामलों में संबंधित कानून लागू करने वाली एजेंसियों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना और रिपोर्टिंग संबंधी दायित्वों का पालन करना महत्वपूर्ण है।
क्या चाहती है याचिकाकर्ता संस्था?
याचिका में ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री से निपटने के लिए एक व्यापक तंत्र विकसित करने की मांग की गई है।
प्रमुख मांगों में—
- ऐसी सामग्री की पहचान और अनिवार्य रिपोर्टिंग की प्रभावी व्यवस्था।
- संबंधित डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया।
- विभिन्न कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय।
- इंटरमीडियरीज के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP)।
- रिपोर्ट मिलने के बाद संबंधित एजेंसियों द्वारा समयबद्ध कार्रवाई।
- रिपोर्टिंग संबंधी कानूनी दायित्वों का पालन नहीं करने वाले प्लेटफॉर्म के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई।
- रिपोर्टिंग प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए केंद्रीकृत ऑनलाइन व्यवस्था।
शामिल हैं।
मध्यस्थ प्लेटफॉर्म को भी बनाया जा सकता है पक्षकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता संस्था को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म समेत संबंधित इंटरमीडियरीज को पक्षकार बनाने के लिए आवेदन दाखिल करने की अनुमति दी है।
इससे आगे की सुनवाई में उन डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों और अनुपालन से जुड़े सवालों पर भी विस्तार से सुनवाई हो सकती है।
POCSO के तहत जिम्मेदारी का सवाल
याचिका में POCSO Act यानी बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले कानून के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों का भी उल्लेख किया गया है।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर यदि बच्चों के यौन शोषण से संबंधित अवैध सामग्री सामने आती है, तो उसकी पहचान, रिपोर्टिंग, साक्ष्य संरक्षण और कानून लागू करने वाली एजेंसियों तक जानकारी पहुंचाने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।
केंद्रीकृत रिपोर्टिंग पोर्टल की मांग
याचिकाकर्ता ने बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़ी रिपोर्टिंग को आसान बनाने के लिए केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल बनाने की भी मांग की है।
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर मौजूद शिकायतों और रिपोर्ट को एक व्यवस्थित तंत्र के जरिए संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाना और कार्रवाई की निगरानी को बेहतर बनाना बताया गया है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब केंद्र सरकार को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर अपना जवाब देना होगा। आगे की सुनवाई में अदालत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारियों, अनिवार्य रिपोर्टिंग, साक्ष्य संरक्षण और सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय जैसे मुद्दों पर निर्देश दे सकती है।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े एक गंभीर मुद्दे पर है। हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी बाकी है। आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य इंटरमीडियरीज को बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान और रिपोर्टिंग के संबंध में किस स्तर की जिम्मेदारी निभानी होगी।
डिस्क्लेमर: इस खबर में याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। मामले में अंतिम निर्णय और अदालत के आगे के निर्देशों के बाद ही कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
