अंतरराष्ट्रीय (Action Bharat) | जर्मनी की राजनीति में फार-राइट पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी चुनावी बढ़त हासिल की है। पूर्वी जर्मनी के सैक्सोनी-एनहाल्ट राज्य में हुए क्षेत्रीय चुनाव में AfD को 44% से अधिक वोट मिलने की बात सामने आई है। इस प्रदर्शन के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार किसी राज्य में फार-राइट पार्टी के सरकार बनाने की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।
AfD के प्रमुख उम्मीदवार उलरिच सिगमंड ने परिणाम को ऐतिहासिक जीत बताते हुए इसे बर्लिन की संघीय सरकार के लिए स्पष्ट राजनीतिक संदेश करार दिया है। इस परिणाम से राज्य में लंबे समय से मजबूत रही मुख्यधारा की पार्टियों, खासकर क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) को बड़ा झटका लगा है।
83 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत से सिर्फ तीन सीट दूर
चुनावी परिणामों के मुताबिक 83 सदस्यीय राज्य विधानसभा में AfD को करीब 39 सीटें मिलने का अनुमान है। सरकार बनाने के लिए 42 सीटों की जरूरत होगी। यानी पार्टी बहुमत से केवल तीन सीट दूर दिखाई दे रही है।
हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती सरकार बनाने को लेकर है। जर्मनी की प्रमुख मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां पहले ही AfD के साथ गठबंधन या सहयोग करने से इनकार करती रही हैं। जर्मन राजनीति में इस रणनीति को आम तौर पर ‘फायरवॉल’ कहा जाता है।
ऐसे में AfD सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सीधे बहुमत की सरकार बनाने में मुश्किल का सामना कर सकती है। यदि कोई दूसरी पार्टी उसके साथ गठबंधन के लिए तैयार नहीं होती है तो अल्पमत सरकार या फिर किसी अन्य राजनीतिक समाधान की स्थिति बन सकती है। परिस्थितियां नहीं सुलझने पर दोबारा चुनाव की संभावना भी पैदा हो सकती है।
CDU के वोट में भारी गिरावट
सैक्सोनी-एनहाल्ट में लंबे समय से प्रभावशाली रही CDU के लिए यह परिणाम खासा निराशाजनक माना जा रहा है। पार्टी को इस बार करीब 17.2% वोट मिले, जबकि 2021 के चुनाव में उसका वोट शेयर 37.1% था।
इस गिरावट को राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। दूसरी ओर AfD की बढ़त ने जर्मनी की राजनीति में प्रवासन, सामाजिक नीतियों और राष्ट्रीय पहचान जैसे मुद्दों को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
AfD के खिलाफ चरमपंथी संगठन होने का वर्गीकरण
AfD की सरकार बनाने की राह में एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक और संस्थागत बाधा है। रिपोर्ट के अनुसार सैक्सोनी-एनहाल्ट में पार्टी की राज्य इकाई को जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी ने दक्षिणपंथी चरमपंथी संगठन के रूप में वर्गीकृत किया है।
इस वजह से अन्य राजनीतिक दलों के लिए AfD के साथ सहयोग करना और भी संवेदनशील मुद्दा बन गया है। पार्टी के विरोधी दलों का कहना है कि उसके साथ किसी तरह का गठबंधन उनकी घोषित राजनीतिक नीति के खिलाफ होगा।
प्रवासियों को लेकर सख्त रुख AfD के एजेंडे में सबसे ऊपर
35 वर्षीय उलरिच सिगमंड के नेतृत्व में AfD ने चुनाव प्रचार के दौरान प्रवासन को प्रमुख मुद्दा बनाया। पार्टी ने अवैध प्रवासियों को वापस भेजने और प्रवासियों को मिलने वाले कुछ सामाजिक प्रोत्साहनों को समाप्त करने की बात कही है।
इसके अलावा पार्टी स्कूलों में पारंपरिक मूल्यों को बढ़ावा देने, प्राइड फ्लैग पर प्रतिबंध लगाने और सार्वजनिक संस्थानों में राष्ट्रीय ध्वज को अधिक प्रमुखता देने जैसी नीतियों की वकालत करती है।
AfD का जोर जर्मनी की जनसंख्या में गिरावट की समस्या से निपटने पर भी है। पार्टी विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता कम करने, विदेशों में रहने वाले जर्मनों को वापस लाने और स्थानीय परिवारों को बेबी बोनस जैसे प्रोत्साहन देने की बात करती है।
आर्थिक असर को लेकर आलोचकों की चिंता
AfD की प्रवासन नीति को लेकर आलोचकों और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि बड़ी संख्या में प्रवासियों को बाहर किया गया या विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता तेजी से कम की गई तो इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेष रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र में विदेशी कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होने के कारण ऐसी नीतियों से कर्मचारियों की कमी और सेवाओं पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अब आगे क्या होगा?
AfD के 44% से अधिक वोट हासिल करने के बाद सैक्सोनी-एनहाल्ट की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। पार्टी बहुमत के बेहद करीब है, लेकिन अन्य दलों के साथ गठबंधन की संभावना फिलहाल मुश्किल दिखाई दे रही है।
इसलिए अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या AfD किसी तरह सरकार बनाने में सफल होगी, या ‘फायरवॉल’ की राजनीति के कारण सबसे अधिक वोट पाने के बावजूद सत्ता से बाहर रह जाएगी? आने वाले दिनों में गठबंधन वार्ता और राज्य की राजनीतिक रणनीति इस सवाल का जवाब तय करेगी।
