धीरूभाई अंबानी की एक चूक और हाथ से निकल गई L&T, आज है देश की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में शामिल; दिलचस्प है पूरी कहानी

कारोबार

नई दिल्ली (Action Bharat) | साल 1988 का दौर था। देश की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के भीतर मालिकाना नियंत्रण और मैनेजमेंट को लेकर संघर्ष चल रहा था। कंपनी की शेयरहोल्डिंग भी काफी बिखरी हुई थी और उसके पुराने विदेशी प्रमोटर भारत से बाहर जा चुके थे। ऐसे समय में रिलायंस ग्रुप के संस्थापक धीरूभाई अंबानी की नजर L&T पर पड़ी।

L&T उस समय भारत की प्रमुख इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक थी। 1988 में कंपनी की बिक्री करीब 500 करोड़ रुपये थी, जो 1995 तक बढ़कर करीब 3,300 करोड़ रुपये हो गई। रिलायंस के लिए L&T का महत्व सिर्फ एक कंपनी खरीदने तक सीमित नहीं था, बल्कि दोनों कारोबारों के बीच संभावित तालमेल भी देखा जा रहा था।

L&T में अंबानी परिवार की एंट्री

1988 में मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी ने L&T में अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की। कंपनी के चेयरमैन एनएम निक्की देसाई के समर्थन के बाद अंबानी परिवार ने L&T के शेयरों का बड़ा ब्लॉक खरीदा।

सितंबर 1988 की बोर्ड मीटिंग में मुकेश अंबानी और एमएल भक्ता को बोर्ड में शामिल करने का प्रस्ताव आया। दोनों ने निदेशक बनने के लिए जरूरी शेयर खरीदे। इसके बाद वे बोर्ड का हिस्सा बने और 30 दिसंबर 1988 को अनिल अंबानी भी निदेशक बनाए गए।

कुछ ही महीनों बाद, 28 अप्रैल 1989 को एनएम निक्की देसाई के इस्तीफे के बाद धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन बन गए।

बोर्डरूम से शुरू हुआ असली संघर्ष

अंबानी परिवार के L&T में आने के बाद कंपनी के पुराने मैनेजमेंट और नए नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ने लगे। देसाई को धीरे-धीरे लगा कि अंबानी परिवार कंपनी के संचालन में अपेक्षा से ज्यादा दखल दे रहा है।

इसी दौरान वित्त मंत्रालय और कंपनी लॉ बोर्ड की ओर से देसाई और उनकी पत्नी को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए। इनमें कम कीमत पर फ्लैट खरीदने की अनुमति, कुछ संस्थाओं को चंदा और कारोबारी फैसलों से कथित नुकसान जैसे मुद्दे शामिल थे।

शेयर खरीद को लेकर उठे सवाल

1989 में L&T पर अंबानी परिवार के नियंत्रण को लेकर विवाद और गहरा गया। इंडियन एक्सप्रेस के एस. गुरुमूर्ति ने L&T अधिग्रहण से जुड़े लेनदेन पर सवाल उठाते हुए जांच शुरू की।

रिपोर्ट के अनुसार, अंबानी परिवार से जुड़ी कंपनियों ने करीब 30 करोड़ रुपये एक निवेश कंपनी में लगाए थे। इसके बाद L&T के शेयरों की खरीद से जुड़े लेनदेन सामने आए। बॉम्बे हाई कोर्ट में भी L&T के शेयर इश्यू और इन लेनदेन को लेकर याचिका दायर हुई, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

सरकार के दखल से बदली पूरी कहानी

विवाद बढ़ने के साथ मामला सिर्फ कॉरपोरेट बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा। सरकार ने भी L&T के बोर्ड में बदलाव की तैयारी शुरू की।

मार्च 1990 में LIC से L&T के चार निदेशकों को हटाने के लिए असाधारण आम बैठक बुलाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इनमें धीरूभाई अंबानी, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और एमएल भक्ता शामिल थे।

अंबानी परिवार ने इसका विरोध किया और सरकार पर गैर-लोकतांत्रिक रवैया अपनाने का आरोप लगाया। हालांकि, अप्रैल 1990 में धीरूभाई अंबानी ने L&T के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया और डी.एन. घोष चेयरमैन बने।

दोबारा वापसी की कोशिश भी नहीं हुई कामयाब

1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ। नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने। इस नए आर्थिक माहौल में अंबानी परिवार ने L&T में दोबारा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की।

लेकिन कंपनी के भीतर से ही अंबानी परिवार के खिलाफ आवाजें उठती रहीं। L&T के नेतृत्व से जुड़े लोगों ने साफ संकेत दिया कि कंपनी को बाहरी कारोबारी समूह के नियंत्रण की जरूरत नहीं है।

1994 तक बोर्ड में अंबानी समर्थक सदस्यों की स्थिति मजबूत होती दिखाई दी। 19 सदस्यीय बोर्ड में अंबानी गुट के पास करीब 10 सदस्यों का समर्थन होने का दावा किया गया, लेकिन वित्त मंत्रालय की मंजूरी न मिलने के कारण नियंत्रण हासिल करने की कोशिश आगे नहीं बढ़ सकी।

आखिर L&T अंबानी के हाथ से क्यों निकल गई?

L&T पर नियंत्रण हासिल करने की धीरूभाई अंबानी की कोशिश कई साल तक चली। लेकिन बोर्डरूम की खींचतान, शेयर लेनदेन को लेकर उठे सवाल, कंपनी के भीतर विरोध और सरकारी दखल ने इस कोशिश को सफल नहीं होने दिया।

आखिरकार अंबानी परिवार को L&T से पीछे हटना पड़ा। इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस कंपनी पर एक समय धीरूभाई अंबानी का नियंत्रण दिखाई दे रहा था, वह अंततः उनके कारोबारी साम्राज्य का हिस्सा नहीं बन सकी।

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