नई दिल्ली (Action Bharat) | चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और हिमालय के दुर्गम इलाकों में निगरानी क्षमता मजबूत करने के लिए भारतीय सेना ने 225 FPV (First-Person View) ड्रोन का ऑर्डर दिया है। इन ड्रोनों का करीब 17,500 फीट की ऊंचाई तक सफल परीक्षण किया गया है।
सेना ने इन ड्रोनों को बेहद कठिन परिस्थितियों में परखा। परीक्षण के दौरान इनकी सहनशक्ति, रफ्तार, सटीकता और अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में संचालन की क्षमता का आकलन किया गया। संख्या के लिहाज से यह ऑर्डर बड़ा नहीं है, लेकिन जिस ऊंचाई और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में इनका परीक्षण हुआ, उसे सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हिमालयी क्षेत्रों में क्यों जरूरी हैं ड्रोन?
LAC और LoC के कई इलाकों में भारतीय सैनिक 12,000 से 18,000 फीट या उससे अधिक की ऊंचाई पर तैनात रहते हैं। लद्दाख और सियाचिन जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां सैनिकों के साथ-साथ पारंपरिक उपकरणों के लिए भी चुनौती पैदा करती हैं।
दूर-दराज की चौकियों तक निगरानी और जरूरी सामान पहुंचाने के लिए ड्रोन तेज और अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरे हैं। हेलीकॉप्टरों की तुलना में ड्रोन का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में कम लागत और कम जोखिम वाला विकल्प हो सकता है।
17,500 फीट पर ड्रोन उड़ाना आसान नहीं
इतनी अधिक ऊंचाई पर ड्रोन संचालन अपने आप में बड़ी तकनीकी चुनौती है। ऊंचाई बढ़ने के साथ हवा का घनत्व कम होता जाता है, जिससे ड्रोन को पर्याप्त लिफ्ट और थ्रस्ट हासिल करना कठिन हो जाता है। कम तापमान मोटर और बैटरी की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है।
खास तौर पर लिथियम-आधारित बैटरियां अत्यधिक ठंड में अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकती हैं। इसलिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ड्रोन की डिजाइन, बैटरी प्रबंधन और संचालन तकनीक बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
स्वदेशी ड्रोन तकनीक पर जोर
भारतीय सेना ने लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के स्पीति जैसे कठिन इलाकों में घरेलू ड्रोन निर्माताओं के साथ परीक्षण और विकास पर काम किया है। इसी प्रक्रिया के आधार पर कई स्वदेशी प्रणालियों को आगे बढ़ाया गया है।
225 FPV ड्रोन का यह ऑर्डर एयरोड्रोन रोबोटिक्स प्राइवेट लिमिटेड को मिलने की जानकारी दी गई है। कंपनी सैन्य ड्रोन, निगरानी और लॉजिस्टिक्स से जुड़े प्लेटफॉर्म के साथ ऑपरेटर ट्रेनिंग भी उपलब्ध कराती है।
यह कदम ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में भारतीय सेना की निगरानी, सामरिक सहायता और ड्रोन आधारित क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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