पटना | (एक्शन भारत) बिहार की राजनीति से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। बिहार सरकार के शहरी विकास, आवास एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री नीतीश मिश्रा के झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचन को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। झंझारपुर से CPI उम्मीदवार रहे राम नारायण यादव ने चुनाव परिणाम को निरस्त करने की मांग करते हुए चुनाव याचिका दाखिल की है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि नामांकन के दौरान नीतीश मिश्रा ने अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों से संबंधित पूरी जानकारी चुनावी हलफनामे में नहीं दी। मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने नीतीश मिश्रा से लिखित जवाब मांगा है।
महत्वपूर्ण: अभी अदालत ने नीतीश मिश्रा का निर्वाचन रद्द नहीं किया है। मामला विचाराधीन है और याचिका में लगाए गए आरोपों पर अंतिम फैसला होना बाकी है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता राम नारायण यादव ने नीतीश मिश्रा के निर्वाचन को चुनौती देते हुए पटना हाईकोर्ट का रुख किया है।
याचिका में मुख्य आरोप यह है कि चुनाव के दौरान दाखिल किए गए हलफनामे में लंबित आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी कथित रूप से उपलब्ध नहीं कराई गई।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार का आपराधिक इतिहास मतदाताओं के सामने स्पष्ट होना चाहिए, ताकि मतदाता उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी के आधार पर अपना फैसला ले सकें।
हाईकोर्ट ने क्या किया?
मामले की प्रारंभिक सुनवाई न्यायाधीश अशोक कुमार पांडेय की एकलपीठ के समक्ष हुई।
अदालत ने चुनाव याचिका को सुनवाई योग्य माना और निर्वाचित उम्मीदवार नीतीश मिश्रा को मामले में अपना पक्ष रखने के लिए लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
इसका मतलब यह है कि फिलहाल मामला अदालत में आगे बढ़ेगा और दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी।
क्या नीतीश मिश्रा की विधायकी चली जाएगी?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल होने या जवाब मांगे जाने का मतलब यह नहीं है कि विधायक की सदस्यता तत्काल समाप्त हो गई है।
अभी अदालत को यह तय करना होगा कि याचिका में लगाए गए आरोप तथ्य और कानून के आधार पर कितने सही हैं। इसके बाद ही निर्वाचन को लेकर कोई अंतिम निर्णय हो सकता है।
इसलिए फिलहाल इसे ‘विधायकी पर अंतिम संकट’ नहीं बल्कि निर्वाचन को लेकर कानूनी चुनौती के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गोपाल कृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का हवाला दिया, जिनमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों द्वारा अपने आपराधिक मामलों की जानकारी मतदाताओं के सामने रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी उम्मीदवार ने महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई है तो इससे मतदाताओं के जानकारी पाने के अधिकार और चुनावी पारदर्शिता पर असर पड़ सकता है।
जनप्रतिनिधित्व कानून की धाराओं का उल्लेख
याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून की धाराओं 80, 80ए और 81 का भी हवाला दिया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि चुनाव प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन की स्थिति में निर्वाचित उम्मीदवार के निर्वाचन को चुनाव याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है।
अब आगे क्या होगा?
अब मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम नीतीश मिश्रा की ओर से हाईकोर्ट में लिखित जवाब दाखिल करना होगा।
इसके बाद याचिकाकर्ता और प्रतिवादी पक्ष की दलीलें सुनी जाएंगी। अदालत उपलब्ध दस्तावेजों और कानूनी दलीलों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगी।
फिलहाल स्थिति
- नीतीश मिश्रा का निर्वाचन हाईकोर्ट में चुनौती के घेरे में है।
- याचिका में चुनावी हलफनामे में आपराधिक मामलों की जानकारी कथित रूप से छिपाने का आरोप है।
- हाईकोर्ट ने लिखित जवाब मांगा है।
- अभी निर्वाचन रद्द करने का कोई अंतिम आदेश नहीं हुआ है।
- आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि लगाए गए आरोप कानूनी रूप से कितने प्रभावी हैं।
एक्शन भारत का निष्कर्ष
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे एक मौजूदा विधायक और बिहार सरकार के मंत्री के निर्वाचन से जुड़ा है। हालांकि, अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। अदालत का अंतिम फैसला आने तक नीतीश मिश्रा की विधायकी को खतरे में या समाप्त मानना सही नहीं होगा।
अब सबकी नजर नीतीश मिश्रा के हाईकोर्ट में दाखिल होने वाले जवाब और आगे की सुनवाई पर है।
