सेवानिवृत्त कर्मचारी से 36 साल पुराने अतिरिक्त वेतन की वसूली नहीं: झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

राज्य

रांची | (एक्शन भारत) झारखंड हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के लिए अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि करीब 36 वर्ष पुराने अतिरिक्त वेतन की वसूली सेवानिवृत्त कर्मचारी से नहीं की जा सकती, खासकर तब जब उसी आरोप को लेकर पहले ही विभागीय जांच हो चुकी हो और कर्मचारी को विभागीय स्तर पर दंड दिया जा चुका हो।

चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए एकल पीठ के आदेश को अधिकांश हिस्सों में बरकरार रखा।

क्या था पूरा मामला?

मामला तारकेश्वर प्रसाद सिंह से जुड़ा है। उनकी सरकारी सेवा में नियुक्ति 13 जनवरी 1975 को ट्रेसर के पद पर हुई थी।

फरवरी 1980 में उन्हें अस्थायी तौर पर जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर प्रोन्नति दी गई। बाद में उनकी इस नियुक्ति और पद पर बने रहने को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

वर्ष 1986 में उन्हें फिर ट्रेसर के पद पर भेज दिया गया। इसके बाद 1987 में पूर्व आदेश वापस लिए जाने के बाद उन्हें दोबारा जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर बहाल कर दिया गया और उनकी नियुक्ति स्थायी कर दी गई। बाद में उन्हें एसीपी का लाभ भी मिला।

2011 में हुई विभागीय कार्रवाई

कई वर्ष बाद वर्ष 2011 में तारकेश्वर प्रसाद सिंह को निलंबित किया गया और उनके खिलाफ 14 आरोप लगाए गए।

इनमें प्रमुख आरोप यह था कि उन्होंने जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर कथित तौर पर अवैध तरीके से बने रहकर उस पद का वेतन प्राप्त किया।

मामले की विभागीय जांच हुई। जांच के बाद कुछ आरोप प्रमाणित पाए गए और विभाग ने उन्हें निंदा की सजा दी। साथ ही उनकी दो वेतन वृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने का दंड भी दिया गया।

यानी विभागीय स्तर पर उसी मामले में कार्रवाई पहले ही हो चुकी थी।

बाद में अतिरिक्त वेतन की वसूली का मामला

विभागीय कार्रवाई के बाद सरकार ने मामले में आपराधिक कार्रवाई का भी निर्णय लिया।

इसके बाद 2013 में जामताड़ा और 2014 में दुमका थाना में मामले दर्ज किए गए।

इस बीच तारकेश्वर प्रसाद सिंह 31 जुलाई 2013 को सेवानिवृत्त हो चुके थे।

सेवानिवृत्ति के बाद उनके खिलाफ पुराने समय में कथित रूप से मिले अतिरिक्त वेतन की वसूली और सेवानिवृत्ति लाभों को लेकर विवाद जारी रहा।

हाई कोर्ट ने वसूली पर लगाई रोक

एकल पीठ ने कर्मचारी से कथित अतिरिक्त वेतन की वसूली पर रोक लगाई थी और उनके सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश दिया था।

राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ खंडपीठ में अपील की।

खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद एकल पीठ के आदेश को अधिकांश हिस्सों में बरकरार रखा।

अदालत ने माना कि इतने पुराने मामले में, विशेषकर जब विभागीय जांच के दौरान आरोपों पर कार्रवाई हो चुकी हो, सेवानिवृत्त कर्मचारी से अतिरिक्त वेतन की वसूली उचित नहीं है।

एक ही आरोप पर दोबारा दंड क्यों?

अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह रहा कि जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर कथित रूप से अवैध तरीके से बने रहने का आरोप पहले ही विभागीय जांच में उठाया जा चुका था।

उस जांच के बाद कर्मचारी को दंड भी दिया गया था।

ऐसे में उसी आरोप के आधार पर दोबारा दंडात्मक कार्रवाई करना उचित नहीं माना गया।

कोर्ट के फैसले का मतलब

इस फैसले में तीन बातें खास तौर पर सामने आती हैं—

1. 36 साल पुराने अतिरिक्त वेतन की वसूली पर रोक
सेवानिवृत्त कर्मचारी से इतने पुराने अतिरिक्त भुगतान की वसूली इस मामले की परिस्थितियों में नहीं की जा सकती।

2. विभागीय कार्रवाई का महत्व
जिस आरोप पर विभागीय जांच हो चुकी हो और कर्मचारी को सजा मिल चुकी हो, उसी आधार पर दोबारा दंडात्मक कार्रवाई पर सवाल उठ सकता है।

3. आपराधिक मामला अलग विषय
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी कर्मचारी पर आपराधिक कृत्य का आरोप है तो प्राथमिकी दर्ज करने से कानून स्वतः रोक नहीं लगाता।

प्राथमिकी पर रोक भी हटी

हालांकि कर्मचारी को अतिरिक्त वेतन की वसूली और सेवानिवृत्ति लाभ के मामले में राहत मिली, लेकिन खंडपीठ ने प्राथमिकी दर्ज करने पर लगाई गई रोक को हटा दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कृत्य के आरोपों की जांच के लिए प्राथमिकी दर्ज करने पर किसी कर्मचारी को स्वतः संरक्षण नहीं मिल सकता।

इसलिए इस फैसले का यह मतलब नहीं है कि कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक जांच पूरी तरह समाप्त हो गई है।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है फैसला?

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के वर्षों बाद वेतन निर्धारण, पदोन्नति या वेतनमान से जुड़ी कथित अतिरिक्त भुगतान की रकम की वसूली को लेकर अक्सर विवाद सामने आते हैं।

इस मामले में हाई कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में सेवानिवृत्त कर्मचारी को राहत दी है। हालांकि, इसे हर मामले में लागू होने वाला पूर्ण और स्वतः लागू नियम मानना उचित नहीं होगा। वसूली का सवाल मामले के तथ्यों, कर्मचारी की भूमिका, भुगतान की परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

एक्शन भारत की नजर में

झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है कि दशकों पुराने वेतन विवादों में सिर्फ आरोप के आधार पर सेवानिवृत्ति के बाद वसूली नहीं की जा सकती, खासकर जब उसी विषय पर विभागीय जांच और दंड पहले ही हो चुका हो।

वहीं, अदालत ने आपराधिक आरोपों के मामले में अलग रुख रखते हुए स्पष्ट किया है कि वेतन वसूली से राहत का अर्थ आपराधिक जांच से स्वतः छूट नहीं है।

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