PM मोदी क्यों चाहते हैं कि भारतीय कम खरीदें सोना और विदेश में न करें डेस्टिनेशन वेडिंग? समझिए 3 पॉइंट्स में पूरा आर्थिक गणित

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बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से अपील की है कि अगर जरूरत न हो तो सोना खरीदने, गैर-जरूरी विदेश यात्रा करने और विदेशों में शादी करने से बचें। प्रधानमंत्री ने यह अपील किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक से दिए गए वीडियो संदेश के जरिए की।

दिलचस्प बात यह है कि यह अपील ऐसे समय आई है जब भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत रफ्तार से आगे बढ़ रही है। अप्रैल-जून तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत रही। इसके बावजूद सरकार का जोर इस बात पर है कि देश का पैसा अनावश्यक रूप से विदेश न जाए।

आखिर सोना खरीदने, विदेश घूमने और डेस्टिनेशन वेडिंग का देश की अर्थव्यवस्था से क्या संबंध है? इसे तीन प्रमुख बिंदुओं से समझा जा सकता है।

1. सोना खरीदने से क्यों बढ़ता है दबाव?

भारत में सोने की मांग काफी ज्यादा है और घरेलू जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। ऐसे में जब देश में सोने की मांग बढ़ती है तो भारत को इसके लिए विदेशों को भुगतान करना पड़ता है।

यानी सोने की खरीद बढ़ने का सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार और डॉलर की मांग पर पड़ सकता है। आयात बढ़ने से व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है और ऐसी स्थिति में रुपये पर दबाव आने की संभावना रहती है।

मार्केट और कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, कच्चे तेल के बाद सोना भारत के प्रमुख आयातों में शामिल है। इसलिए सोने की मांग में बड़ी बढ़ोतरी का असर देश के आयात बिल पर पड़ सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स में इस साल सोने के आयात में भी तेज बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है। अप्रैल से शुरू हुए वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में सोने का आयात पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 32 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ने की बात सामने आई है।

वहीं जुलाई में भारत का व्यापार घाटा करीब 32 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो जनवरी के बाद सबसे ऊंचे स्तरों में बताया गया है।

सोने की मांग सिर्फ निवेश तक सीमित नहीं

भारत में सोना केवल निवेश के लिए नहीं खरीदा जाता। शादियों, त्योहारों, पारिवारिक परंपराओं और घरेलू बचत में भी इसकी बड़ी भूमिका है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है। ऐसे में घरेलू मांग में छोटा बदलाव भी देश के कुल सोना आयात पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

यही वजह है कि प्रधानमंत्री की अपील को केवल व्यक्तिगत खरीदारी से जोड़कर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके पीछे विदेशी मुद्रा के बहिर्गमन और आयात बिल को नियंत्रित करने का आर्थिक तर्क भी है।


2. विदेश घूमने के बजाय भारत में खर्च करने की अपील क्यों?

प्रधानमंत्री की अपील का दूसरा हिस्सा विदेश यात्रा से जुड़ा है।

जब कोई भारतीय विदेश यात्रा करता है तो होटल, रेस्तरां, स्थानीय परिवहन, मनोरंजन, खरीदारी और अन्य सेवाओं पर खर्च करता है। इसका बड़ा हिस्सा उस देश की अर्थव्यवस्था में जाता है जहां भारतीय पर्यटक यात्रा कर रहा है।

इसके विपरीत, अगर यही खर्च भारत के किसी पर्यटन स्थल पर किया जाता है तो पैसा भारतीय होटल, रेस्तरां, टैक्सी, टूर ऑपरेटर, स्थानीय दुकानदार और अन्य सेवा प्रदाताओं तक पहुंचता है।

यानी प्रधानमंत्री का जोर घरेलू खपत और भारत के भीतर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने पर है।

उनका संदेश साफ था कि अगर छुट्टियां मनाने की योजना है तो भारत के ही अलग-अलग पर्यटन स्थलों को प्राथमिकता दी जा सकती है।


3. डेस्टिनेशन वेडिंग का पैसा विदेश जाने से क्या नुकसान?

विदेश में होने वाली बड़ी शादियों में खर्च केवल शादी के वेन्यू तक सीमित नहीं रहता। इसमें होटल, मेहमानों की यात्रा, भोजन, सजावट, मनोरंजन और अन्य सेवाओं पर बड़ी रकम खर्च होती है।

अगर ऐसी शादी विदेश में होती है तो इस खर्च का बड़ा हिस्सा विदेशी कारोबारियों और सेवा प्रदाताओं को मिलता है।

प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में ‘Wed in India’ का संदेश दिया है। उनका कहना है कि भारतीय परिवार अपनी शादियों के लिए देश के ही अलग-अलग खूबसूरत स्थानों को चुन सकते हैं।

इससे शादी का बड़ा खर्च भारत के भीतर रह सकता है और इसका लाभ स्थानीय होटल उद्योग, पर्यटन, कैटरिंग, इवेंट मैनेजमेंट, परिवहन, हस्तशिल्प और दूसरे कारोबारों को मिल सकता है।

यानी डेस्टिनेशन वेडिंग को भारत में बढ़ावा देने का उद्देश्य केवल पर्यटन बढ़ाना नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करना भी है।


7.8% GDP ग्रोथ के बावजूद चिंता क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भारत की अर्थव्यवस्था अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है तो फिर प्रधानमंत्री लोगों को खर्च कम करने या खर्च का स्थान बदलने की अपील क्यों कर रहे हैं?

इसका जवाब भारत की आयात निर्भरता में छिपा है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ जाता है और इसके लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है।

ऐसे समय में अगर सोने का आयात भी तेजी से बढ़ता है तो विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता भी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। किसी बड़े व्यवधान की स्थिति में तेल की कीमतों और भारत के आयात बिल पर असर पड़ सकता है।

सरकार का संदेश क्या है?

प्रधानमंत्री की अपील को मोटे तौर पर ‘पैसा भारत में खर्च करें’ के संदेश के रूप में देखा जा सकता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीयों को सोना खरीदना या विदेश जाना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। जोर मुख्य रूप से गैर-जरूरी खर्च को भारत की अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ने पर है।

सरल शब्दों में पूरा गणित यह है—

सोने का ज्यादा आयात → ज्यादा डॉलर की जरूरत → आयात बिल और व्यापार घाटे पर दबाव

विदेश यात्रा → पैसा विदेशी होटल और कारोबार में खर्च

विदेशी डेस्टिनेशन वेडिंग → शादी का बड़ा खर्च देश से बाहर

इसके उलट—

भारत में सोना छोड़कर दूसरे उत्पादों/निवेशों की ओर रुख + घरेलू पर्यटन + ‘Wed in India’ → देश के भीतर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा।

यही वह आर्थिक तर्क है जिसके आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीयों से गैर-जरूरी विदेशी खर्च कम करने और घरेलू अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की अपील कर रहे हैं।

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