‘बच्चे के अधिकार सर्वोपरि’, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; गोद लेने वाले माता-पिता को बच्चा सौंपने का आदेश

राष्ट्रीय

नई दिल्ली (Action Bharat) | सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए हैदराबाद की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को बच्चे को उसे गोद लेने वाले माता-पिता होने का दावा करने वाले दंपती को सौंपने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले में आई, जिसमें बच्चे को इस आशंका के आधार पर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने अपनी कस्टडी में लिया था कि उसकी जैविक मां ने बच्चे को दंपती को बेच दिया था। शीर्ष अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए केवल आर्थिक मजबूरी के आधार पर बच्चे को दिए जाने को अपने आप ‘बिक्री’ नहीं माना।

तेलंगाना हाई कोर्ट का आदेश रद्द

  • सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तेलंगाना हाई कोर्ट के 12 जून 2025 के आदेश को रद्द कर दिया।
  • यह फैसला मोहम्मद अकबर और अन्य की अपील पर सुनाया गया।
  • मामले की सुनवाई जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने की।
  • अदालत ने हैदराबाद की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को बच्चे को संबंधित दंपती को सौंपने का निर्देश दिया।

आर्थिक मजबूरी को बच्चे की बिक्री नहीं माना जा सकता

मामले में बच्चे को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने इस संदेह के आधार पर कस्टडी में लिया था कि उसकी जैविक मां ने उसे पैसे लेकर दंपती को बेच दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि जैविक मां आर्थिक तंगी के कारण बच्चे की देखभाल करने की स्थिति में नहीं थी और इसी वजह से उसने बच्चे को गोद दिया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बच्चे को बेच दिया गया था।

बच्चे की देखभाल भी रही महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया जिसमें संबंधित दंपती ने बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं की हो।

अदालत के सामने मुख्य सवाल बच्चे के हित और उसकी कस्टडी से जुड़ा था। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए बच्चे को संबंधित दंपती को सौंपने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट में एक ही दिन के अन्य अहम फैसले

स्रोत के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इसी दौरान NSE के को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों में SEBI और NSE के बीच समझौते को भी मंजूरी दी। समझौते के तहत NSE द्वारा कुल ₹1,491.21 करोड़ का भुगतान शामिल है। इसमें को-लोकेशन मामले के लिए ₹1,223.56 करोड़ और डार्क फाइबर मामले के लिए ₹267.65 करोड़ शामिल हैं।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल पुराने एक हत्या मामले में चार लोगों की सजा और उम्रकैद को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों द्वारा अपराध किए जाने को पर्याप्त रूप से साबित करने में सफल नहीं रहा।

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