नई दिल्ली (Action Bharat) | सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब से होने वाली घटनाओं को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि सिर्फ शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से जहरीली शराब की घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। अदालत ने गुजरात में लंबे समय से लागू शराबबंदी के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि वहां मेथनॉल मिली जहरीली शराब से जुड़ी कई बड़ी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हुई है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि केवल शराबबंदी को समाधान मानना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जहरीली और नकली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए मेथनॉल की खरीद, भंडारण, परिवहन और इस्तेमाल पर कड़ी निगरानी समेत कई उपाय सुझाए हैं।
महाराष्ट्र के नियमों पर सुनवाई के दौरान आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महाराष्ट्र विष नियम, 1972 के नियम 18ए और 18बी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई।
जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इन दोनों नियमों को रद्द कर दिया।
इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद और उसे रखने को नियंत्रित किया जाता था। साथ ही गैर-औषधि निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें रंग और कड़वाहट मिलाना अनिवार्य किया गया था।
अदालत ने इस पूरे मुद्दे पर जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए व्यापक सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया।
गुजरात के अनुभव का अदालत ने किया उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गुजरात में लंबे समय से लागू शराबबंदी व्यवस्था का उल्लेख किया।
अदालत के अनुसार, गुजरात में शराब पर प्रतिबंध होने के बावजूद मेथनॉल मिली जहरीली शराब से जुड़ी कम से कम 10 बड़ी घटनाएं हुई हैं। इन घटनाओं में 600 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।
अदालत ने इन घटनाओं को इस बात के संदर्भ में देखा कि केवल शराब की बिक्री या सेवन पर प्रतिबंध लगाने से जहरीली शराब की समस्या अपने आप समाप्त नहीं हो जाती।
शराबबंदी से अवैध कारोबार भूमिगत होने की आशंका
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात का अनुभव यह बताता है कि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से गैरकानूनी शराब का कारोबार भूमिगत हो सकता है।
ऐसी स्थिति में अवैध शराब का उत्पादन और वितरण नियंत्रित व्यवस्था से बाहर हो सकता है। अदालत के अनुसार, इससे ऐसी शराब के प्रसार का खतरा बढ़ सकता है जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से नुकसानदायक और जानलेवा हो।
इसलिए अदालत ने केवल प्रतिबंध पर निर्भर रहने के बजाय मेथनॉल की पूरी सप्लाई चेन पर निगरानी और नियंत्रण की जरूरत बताई।
मेथनॉल की खरीद से लेकर इस्तेमाल तक निगरानी की जरूरत
शीर्ष अदालत ने राज्यों को मेथनॉल के इस्तेमाल से जुड़े कई सुरक्षा उपायों पर ध्यान देने को कहा।
अदालत द्वारा सुझाए गए प्रमुख उपायों में शामिल हैं:
- मेथनॉल खरीदने वाले लाइसेंस धारकों का सत्यापन।
- मेथनॉल के इस्तेमाल पर नियमित निगरानी।
- खरीदे गए और इस्तेमाल किए गए स्टॉक का मिलान।
- इस्तेमाल नहीं किए गए मेथनॉल को वापस करने की व्यवस्था।
- मेथनॉल के परिवहन और भंडारण पर कड़े नियंत्रण।
- इसके परिवहन के लिए समर्पित टैंकरों का इस्तेमाल।
- परिवहन के दौरान छेड़छाड़-रोधी सील लगाने जैसे सुरक्षा उपाय।
इन उपायों का उद्देश्य मेथनॉल के गलत इस्तेमाल और उसके अनधिकृत तरीके से शराब बनाने में इस्तेमाल होने की संभावना को कम करना है।
राज्य की सीमाओं पर भी कड़ी निगरानी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शराब का उत्पादन राज्य के भीतर भी हो सकता है और बाहर से भी लाई जा सकती है। ऐसे में केवल राज्य के अंदर निगरानी करना पर्याप्त नहीं होगा।
अदालत के अनुसार, शराब की अवैध आवाजाही रोकने के लिए राज्य की सीमाओं पर कड़ी निगरानी जरूरी है।
इसके साथ ही राज्य के भीतर शराब की खरीद, निर्माण, परिवहन, बिक्री और इस्तेमाल से संबंधित पूरक कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करना भी महत्वपूर्ण है।
देसी शराब बनाने वालों की पहचान और कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि राज्य पुलिस और संबंधित विभाग मिलकर अवैध देसी शराब बनाने वालों की पहचान कर सकते हैं।
इसके लिए:
- राज्य पुलिस
- शराबबंदी लागू करने वाले विभाग
- उत्पाद कर विभाग
आपस में समन्वय कर सकते हैं।
इन विभागों के बीच बेहतर तालमेल के जरिए अवैध शराब बनाने वालों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
नकली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए समग्र व्यवस्था पर जोर
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि जहरीली शराब की समस्या को केवल शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने मेथनॉल जैसी खतरनाक सामग्री की खरीद से लेकर उसके इस्तेमाल और परिवहन तक पूरी प्रक्रिया पर निगरानी की जरूरत बताई है।
इसके साथ ही राज्य की सीमाओं पर निगरानी, अवैध शराब निर्माताओं की पहचान, संबंधित विभागों के बीच समन्वय और मौजूदा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के सुझावों के मुख्य बिंदु
शराबबंदी: केवल पूर्ण शराबबंदी को जहरीली शराब की घटनाओं का अकेला समाधान नहीं माना जा सकता।
मेथनॉल निगरानी: इसकी खरीद, स्टॉक, इस्तेमाल, परिवहन और भंडारण पर कड़ा नियंत्रण जरूरी है।
लाइसेंसधारी: मेथनॉल खरीदने वाले लाइसेंस धारकों का सत्यापन किया जाना चाहिए।
स्टॉक मिलान: खरीदे गए और इस्तेमाल किए गए मेथनॉल का हिसाब रखा जाना चाहिए।
परिवहन: समर्पित टैंकर और छेड़छाड़-रोधी सील जैसे सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं।
राज्य सीमा: शराब की आवाजाही रोकने के लिए सीमाओं पर निगरानी मजबूत करने की जरूरत है।
विभागीय समन्वय: पुलिस, शराबबंदी विभाग और उत्पाद कर विभाग मिलकर अवैध शराब निर्माताओं के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं।
कानून का पालन: राज्य के भीतर शराब की खरीद, निर्माण, परिवहन, बिक्री और इस्तेमाल से जुड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकने के लिए प्रतिबंध के साथ-साथ निगरानी, नियमन, कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और विभागों के बीच समन्वय पर जोर दिया है।
गुजरात में सामने आई जहरीली शराब की घटनाओं का उल्लेख करते हुए अदालत ने संकेत दिया कि अवैध शराब के खिलाफ प्रभावी व्यवस्था के लिए उसकी पूरी सप्लाई चेन पर नजर रखना आवश्यक है। मेथनॉल की खरीद और इस्तेमाल से लेकर उसके परिवहन तथा अवैध शराब बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई तक, कई स्तरों पर नियंत्रण की जरूरत है।
Action Bharat | National Desk
