मातृ नवमी 2026: क्या है पितृ दोष और मातृ ऋण का संबंध? कुंडली के इन भावों को माना जाता है महत्वपूर्ण

धर्म-अध्यात्म

नई दिल्ली (Action Bharat) | पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन दिवंगत माताओं और परिवार की अन्य दिवंगत स्त्रियों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मातृ नवमी का संबंध मातृ ऋण और पितृ दोष से भी जोड़ा जाता है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, पितृ दोष का संबंध केवल पिता या पितृवंश से ही नहीं, बल्कि मातृकुल से भी माना जाता है। मान्यता है कि माता या मातृ पक्ष के पूर्वजों के प्रति अनादर, उपेक्षा अथवा अधूरे धार्मिक कर्मों को मातृ ऋण से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, ये बातें धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।

मातृ नवमी क्यों मनाई जाती है?

ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी को मातृ नवमी कहा जाता है। इस दिन दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों, सास और परिवार की अन्य दिवंगत स्त्रियों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध कर्म किए जाने की मान्यता है।

मातृ नवमी और पितृ दोष का संबंध

ज्योतिषीय मान्यताओं में पितृ दोष को केवल पितृ पक्ष तक सीमित नहीं माना जाता। मातृकुल यानी माता और ननिहाल पक्ष के पूर्वजों से जुड़ी अतृप्ति या उनके प्रति उपेक्षा को भी इससे जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से मातृ नवमी पर किए जाने वाले तर्पण और दान को मातृ पक्ष के प्रति कर्तव्य निभाने का माध्यम माना जाता है।

कुंडली में किन भावों और ग्रहों को माना जाता है महत्वपूर्ण?

ज्योतिष के अनुसार, मातृ ऋण का संबंध जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव, चंद्रमा और शुक्र से जोड़ा जाता है। चतुर्थ भाव को माता और पारिवारिक सुख से संबंधित माना जाता है, जबकि चंद्रमा और शुक्र को भी मातृ पक्ष से जुड़े ज्योतिषीय संकेतकों के रूप में देखा जाता है।

मान्यता है कि पूर्व जन्म में माता या माता तुल्य स्त्रियों के प्रति किए गए व्यवहार का संबंध भी मातृ ऋण से जोड़ा जाता है। यह ज्योतिषीय विश्वास है, इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

मातृ ऋण से मुक्ति के लिए बताए जाते हैं ये उपाय

  • जीवित माता का सम्मान: माता की सेवा, उनका आदर और उनकी जरूरतों का ध्यान रखना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • दिवंगत माताओं के नाम से दान: मातृ नवमी पर चांदी, सफेद वस्त्र, दूध, चावल और खीर का दान करने की धार्मिक मान्यता है।
  • भोजन और सेवा: सुहागिन महिलाओं या जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा भी बताई जाती है।
  • तर्पण और श्राद्ध: दिवंगत माताओं और मातृकुल की स्त्रियों के निमित्त विधि-विधान से श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।

ज्योतिषीय मान्यताओं में चंद्रमा और चतुर्थ भाव से जुड़े कुछ उपाय भी बताए जाते हैं, जैसे चांदी धारण करना या दान करना। ऐसे उपायों को आस्था के विषय के रूप में ही देखना चाहिए।

मातृ नवमी का मूल संदेश दिवंगत माताओं और पूर्वज स्त्रियों का स्मरण, उनके प्रति कृतज्ञता और जीवित माता सहित परिवार की महिलाओं का सम्मान करना है।

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