नई दिल्ली (Action Bharat) | संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत 2 अक्टूबर से शुरू हो गया है। बिहार, झारखंड और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह पर्व तीन दिनों तक चलता है। इस दौरान माताएं पारंपरिक नियमों के अनुसार पूजा-पाठ और व्रत करती हैं।
इस वर्ष पर्व की शुरुआत 2 अक्टूबर को नहाय-खाय से हुई। 3 अक्टूबर को मुख्य निर्जला व्रत रखा जाएगा, जबकि 4 अक्टूबर की सुबह पारण के साथ व्रत पूरा होगा।
तीन दिनों का कार्यक्रम
- 2 अक्टूबर — नहाय-खाय: व्रती महिलाएं स्नान के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी, तोरी और कद्दू की सब्जी खाने की परंपरा है।
- 3 अक्टूबर — मुख्य व्रत: सूर्योदय से पहले ओठगन की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद निर्जला व्रत का संकल्प लिया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता।
- 4 अक्टूबर — पारण: अष्टमी तिथि समाप्त होने और सूर्योदय के बाद पूजा-अर्चना कर व्रत खोला जाएगा।
जितिया व्रत 2026: शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7:59 बजे शुरू होकर 4 अक्टूबर को सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी।
- व्रत संकल्प के लिए अभिजीत मुहूर्त: 3 अक्टूबर, सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक।
- मुख्य पूजा का समय: 3 अक्टूबर, शाम 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक।
- पारण का समय: 4 अक्टूबर, सुबह 6:15 बजे से 7:27 बजे तक।
पंचांग के समय में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत करने वाले श्रद्धालु अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि जरूर कर लें।
पूजा में किन सामग्रियों की होगी जरूरत?
भगवान जीमूतवाहन की पूजा के लिए फूल, माला, पीले वस्त्र, सिंदूर, मौली, गंगाजल, पंचामृत, दीपक, धूप, कपूर, अक्षत, चंदन, हल्दी, दूर्वा, फल, मिठाई, पान, सुपारी, लौंग, इलायची और लाल-पीला जिउतिया धागा रखा जाता है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा सामग्री में बदलाव हो सकता है।
कैसे करें पूजा?
सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई कर भगवान जीमूतवाहन का प्रतीक स्थापित करें। दीपक जलाकर फूल, अक्षत और अन्य पारंपरिक सामग्री अर्पित करें। इसके बाद जीमूतवाहन की व्रत कथा और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार चील-सियारिन की कथा सुनें। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना के साथ पूजा करें। कई क्षेत्रों में कथा के बाद माताएं जिउतिया धागा गले में धारण करती हैं।
जीमूतवाहन की कथा का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन ने एक नाग माता के पुत्र शंखचूड़ को गरुड़ से बचाने के लिए स्वयं को उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। जीमूतवाहन के परोपकार और साहस से प्रसन्न होकर गरुड़ ने उन्हें जीवनदान दिया और भविष्य में किसी नाग को अपना आहार न बनाने का वचन दिया। इसी मान्यता के चलते संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।
व्रत के दौरान स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान
जितिया व्रत पारंपरिक रूप से निर्जला रखा जाता है, लेकिन व्रत करने वाली महिलाओं को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। गंभीर स्वास्थ्य समस्या होने पर कठोर उपवास न करें और डॉक्टर द्वारा बताई गई जरूरी दवाएं बंद न करें। पारण के समय भी हल्का और सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है।
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